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शंकर चंद्राकर, वरिष्ठ पत्रकार

इजराइल-अमेरिका और ईरान युद्ध से एक बार फिर मिडिल ईस्ट एशिया जंग की आग में झुलस रहा है। मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) दुनिया का वह क्षेत्र है जो इतिहास के लंबे कालखंड से संघर्ष, युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता का केंद्र रहा है। आज भी जब दुनिया के कई हिस्सों में शांति और विकास की दिशा में प्रयास हो रहे हैं, तब भी मध्य पूर्व के कई देश युद्ध, गृह युद्ध, आतंकवाद और राजनीतिक संघर्ष से जूझ रहे हैं। यह सवाल अकसर उठता है कि आखिर ऐसा क्या कारण है कि सदियों से यह क्षेत्र जंग का मैदान बना हुआ है। इसके पीछे देखें तो ऐतिहासिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक कई जटिल कारण हैं।

इसका पहला कारण ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और साम्राज्यों की विरासत में देख सकते हैं। मध्य पूर्व मानव सभ्यता के सबसे पुराने क्षेत्रों में से एक है। प्राचीन काल में यहां कई महान सभ्यताएं विकसित हुईं, जैसे कि मेसोपोटामिया, फारस और मिस्र की सभ्यताएं। समय-समय पर इस क्षेत्र पर विभिन्न साम्राज्यों का शासन रहा। विशेष रूप से ओटोमन साम्राज्य ने लगभग 600 वर्षों तक मध्य पूर्व के बड़े हिस्से पर शासन किया, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के बाद यह साम्राज्य टूट गया। प्रथम विश्व युद्ध के बाद यूरोपीय शक्तियों, विशेषकर यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटिश) और फ्रांस ने इस क्षेत्र की सीमाओं को अपने हितों के अनुसार बांट दिया। यह विभाजन कई बार स्थानीय जातीय, धार्मिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं को नजरअंदाज करके किया गया, जिसके कारण कई देशों में आंतरिक संघर्ष की नींव पड़ गई। उदाहरण के लिए इराक, सीरिया और जॉर्डन की सीमाएं औपनिवेशिक शक्तियों ने तय कीं, जिससे विभिन्न समुदायों के बीच तनाव पैदा हुआ।

दूसरा अहम कारण इस क्षेत्र में धर्म और सांप्रदायिक संघर्ष का रहा है। मध्य पूर्व तीन प्रमुख अब्राहमिक धर्मों-इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्म का जन्मस्थली है। तीनों धर्मों के अपने सिद्धांत व मान्यताएं हैं। इसी कारण यह क्षेत्र धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील है। इस्लाम के भीतर भी दो प्रमुख संप्रदाय हैं-सुन्नी और शिया। इन दोनों के बीच ऐतिहासिक मतभेद भी कई बार राजनीतिक संघर्ष में बदल जाते हैं। उदाहरण के लिए सऊदी अरब मुख्य रूप से सुन्नी देश है, जबकि ईरान शिया बहुल देश है। इन दोनों देशों के बीच प्रभाव की होड़ अकसर पूरे क्षेत्र में तनाव को बढ़ाती है।

तीसरा प्रमुख कारण इजराइल-फिलिस्तीन का विवाद है। मध्य पूर्व के सबसे लंबे और जटिल संघर्षों में से एक इजराइल और फिलिस्तीन के बीच का विवाद है। 1948 में इजराइल के गठन के बाद अरब देशों और इजराइल के बीच कई युद्ध हुए। फिलिस्तीनी लोग अपने स्वतंत्र राष्ट्र की मांग करते रहे हैं, जबकि इजराइल अपनी सुरक्षा और सीमाओं को लेकर चिंतित रहता है। अरब इस्लामी देशों से घिरे यहूदी बहुल इजराइल अपने अस्तित्व को लेकर हमेशा सशंकित रहता है। इस कारण इस संघर्ष ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा की है और कई बार यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन जाता है।

इस क्षेत्र में संघर्ष का चौथा प्रमुख कारण तेल और प्राकृतिक संसाधनों की राजनीति रहा है। मध्य पूर्व दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों वाला क्षेत्र है। यहां के देशों में तेल और गैस की अपार संपदा है। ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) के कई प्रमुख सदस्य इसी क्षेत्र से आते हैं। तेल के कारण यह क्षेत्र वैश्विक शक्तियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया है। दुनिया की बड़ी शक्तियां जैसे अमेरिका, रूस और यूरोपीय देश यहां अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करना चाहते हैं। कई बार इन शक्तियों की प्रतिस्पर्धा भी क्षेत्रीय संघर्षों को बढ़ावा देती है।
यही नहीं मध्य पूर्व में बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप भी युद्धों का बड़ा कारण रहा है। उदाहरण के लिए 2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला किया। इसका उद्देश्य तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को हटाना था, लेकिन इस युद्ध के बाद इराक में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रही और आतंकवादी संगठनों को पनपने का मौका मिला। इसी तरह सीरिया के गृह युद्ध में कई अंतरराष्ट्रीय शक्तियां शामिल हो गईं, जिससे संघर्ष और जटिल हो गया। मध्य पूर्व में धार्मिक, जातीय व राजनीतिक संघर्षों के चलते इस क्षेत्र में कई चरमपंथी संगठनों का उदय भी हुआ है। इनमें सबसे कुख्यात संगठन इस्लामिक स्टेट रहा है, जिसने 2014 के आसपास इराक और सीरिया के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। ऐसे संगठन राजनीतिक अस्थिरता और धार्मिक कट्टरता का फायदा उठाकर हिंसा को बढ़ाते रहे हैं।

देखा जाए तो जातीय और सांस्कृतिक विविधता भी इस इलाके में संघर्ष का कारण रहा है। मध्य पूर्व में केवल अरब ही नहीं रहते। यहां कई अन्य जातीय समूह भी हैं, जैसे कुर्द, तुर्क, फारसी आदि। कुर्द लोग लंबे समय से अपने स्वतंत्र राष्ट्र की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनका क्षेत्र कई देशों- तुर्किये, इराक, ईरान और सीरिया में फैला हुआ है। इस कारण क्षेत्रीय तनाव लगातार बना रहता है। 
इस पूरे क्षेत्र में लंबे समय से तानाशाही और राजनीतिक अस्थिरता भी वहां संघर्षों के प्रमुख कारण रहा है। मध्य पूर्व के कई देशों में लंबे समय तक तानाशाही शासन रहा है। जब जनता को लोकतांत्रिक अधिकार नहीं मिलते, तो असंतोष बढ़ता है। 2011 में हुए अरब स्प्रिंग आंदोलन में कई देशों में जनता ने सरकारों के खिलाफ विद्रोह किया, लेकिन कई जगह यह आंदोलन लोकतंत्र लाने के बजाय गृह युद्ध में बदल गया, जैसे कि सीरिया में देखा गया। इसके पूर्व इराक में में यही स्थिति रही। 

मिडिल ईस्ट का भू-राजनीतिक महत्व भी यहां संघर्षों को जन्म दिया है। मध्य-पूर्व एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच स्थित है। सदियों से यह क्षेत्र सिल्क रूट का हिस्सा रहा है। यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए स्वेज केनाल दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। इसी तरह स्ट्रेट ऑफ होरमुज से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल (20 फीसदी से अधिक) गुजरता है। इस कारण अमेरिका जैसी बड़ी शक्तियां इस क्षेत्र पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहती हैं। यही कारण है कि ये शक्तियां अपना प्रभुत्व बनाये रखने के लिए भी कई बार इस क्षेत्र को संघर्ष की आग में झोंक देती है।  

इस तरह देखा जाए तो मध्य पूर्व का इतिहास अत्यंत जटिल और बहुआयामी रहा है। यहां के संघर्षों के पीछे केवल एक कारण नहीं, बल्कि कई ऐतिहासिक, धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक कारक काम करते हैं। औपनिवेशिक सीमाएं, धार्मिक विभाजन, तेल की राजनीति, बाहरी शक्तियों की दखलअंदाजी और आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता इन सबने मिलकर इस क्षेत्र को लंबे समय तक संघर्ष और जंग का मैदान बनाए रखा है। फिर भी यह समझना जरूरी है कि मध्य पूर्व केवल युद्धों की कहानी नहीं है। यह सभ्यताओं, संस्कृतियों और मानव इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र भी है। यदि क्षेत्रीय सहयोग, राजनीतिक सुधार और अंतरराष्ट्रीय संतुलन कायम हो सके, तो भविष्य में मध्य पूर्व भी शांति और स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि मिडिल ईस्ट का जंग का मैदान बने रहना इतिहास, राजनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन का परिणाम है।