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शंकर चंद्राकर, वरिष्ठ पत्रकार 

बस्तर के आखिरी बड़े नक्सली पापाराव समेत 17 नक्सलियों के सरेंडर करने के साथ ही बस्तर सहित पूरा प्रदेश नक्सलवाद से मुक्त होने के कगार पर है। केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ सहित देश को 31 मार्च 2026 तक नक्सल मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। इसमें पापाराव का अपने साथियों सहित सरेंडर बस्तर में नक्सलवाद के ताबूत पर आखिरी कील साबित होता दिख रहा है। कई दशकों तक नक्सलवाद का दंश झेल रहे बस्तर में इसके खात्मे के साथ ही शांति, सुरक्षा और विकास की नई सुबह होने वाली है। नक्सल उन्मूलन की दिशा में केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार की समन्वित नीति बेहद कारगर साबित हुई है। 
बस्तर संभाग लंबे समय तक नक्सलवाद की छाया में जीता रहा है। घने जंगलों, पहाड़ी भूभाग और दूरस्थ आदिवासी बस्तियों वाला यह क्षेत्र कभी 'रेड कॉरिडोर' का प्रमुख केंद्र माना जाता था। दशकों तक चली हिंसा, भय और पिछड़ापन ने यहां के जनजीवन को प्रभावित किया, लेकिन अब परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। राज्य और केंद्र सरकार की समन्वित रणनीति, सुरक्षा बलों की सक्रियता, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और विकास योजनाओं के प्रभाव से यह दावा मजबूत हुआ है कि 31 मार्च 2026 से बस्तर नक्सल मुक्त हो जाएगा। यह केवल एक प्रशासनिक घोषणा नहीं, बल्कि बस्तर के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में ऐतिहासिक मोड़ है।
बस्तर में नक्सलवाद की जड़ें सामाजिक-आर्थिक उपेक्षा, भौगोलिक अलगाव और विकास की कमी में रही हैं। 1990 के दशक से यह क्षेत्र माओवादी गतिविधियों का मजबूत आधार बन गया। जंगलों में छिपे उग्रवादी नक्सल संगठनों ने स्थानीय युवाओं को अपने साथ जोड़ा, हथियारबंद संघर्ष को बढ़ावा दिया और सरकारी ढांचे को चुनौती दी। सुरक्षा बलों पर हमले, सड़क निर्माण में बाधांँ, स्कूल भवनों को नुकसान और ग्रामीणों में भय का माहौल—इन सबने बस्तर को लंबे समय तक अस्थिर रखा। कई निर्दोष नागरिक और जवान इस संघर्ष में शहीद हुए, लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि केवल सैन्य कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है, इसलिए सरकार ने 'सुरक्षा और विकास' की दोहरी नीति अपनाई, यानी एक ओर उग्रवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई और दूसरी ओर जनता का विश्वास जीतने के लिए तेज विकास।
पिछले कुछ वर्षों में बस्तर में सुरक्षा तंत्र को व्यापक रूप से मजबूत किया गया। स्थानीय युवाओं को जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) और अन्य बलों में शामिल किया गया। इससे सुरक्षा अभियानों को स्थानीय भौगोलिक और सामाजिक समझ मिली। साथ ही, खुफिया तंत्र को आधुनिक तकनीक से जोड़ा गया। जंगल क्षेत्रों में नियमित सर्च ऑपरेशन, नक्सल नेतृत्व के खिलाफ लक्षित कार्रवाई और आपूर्ति तंत्र को तोडऩे की रणनीति ने उग्रवाद की रीढ़ कमजोर की, परंतु यह केवल कठोर कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा। प्रशासन ने यह भी सुनिश्चित किया कि आम ग्रामीणों को किसी प्रकार की असुविधा न हो और विकास कार्य समानांतर रूप से चलते रहें।

सरेंडर और पुनर्वास नीति
नक्सल उन्मूलन अभियान का सबसे सकारात्मक पहलू रहा है बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण। हजारों नक्सलियों ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया। सरकार ने पुनर्वास नीति के तहत उन्हें आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण, शिक्षा और रोजगार के अवसर दिए। कई पूर्व नक्सली आज स्वरोजगार, खेती, छोटे व्यवसाय और सरकारी योजनाओं से जुड़कर सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं। यह परिवर्तन केवल सुरक्षा उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का संकेत है। जब पूर्व उग्रवादी समाज निर्माण में सहभागी बनते हैं, तो हिंसा का चक्र स्वत: कमजोर पड़ता है।

विकास की तेज रफ्तार 
नक्सलवाद की जड़ें अविकास में थीं, इसलिए विकास को प्राथमिकता देना आवश्यक था। बीते वर्षों में बस्तर में सड़क निर्माण ने अभूतपूर्व गति पकड़ी। छत्तीसगढ़ सरकार ने 'नियद नेल्लानार' (आपका अच्छा गांव) योजना के तहत नक्सल प्रभावित गांवों में सुरक्षाबलों के शिविरों के साथ-साथ सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं तेजी से पहुंचाई जा रही हैं। जिन गांवों तक कभी पैदल पहुंचना मुश्किल था, वहां आज पक्की सड़कें बन रही हैं। स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ है। दूरस्थ इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, मोबाइल मेडिकल यूनिट और मातृ-शिशु योजनाएँ प्रभावी ढंग से लागू की गई हैं। शिक्षा के क्षेत्र में आवासीय विद्यालय, आश्रम शालाएं और छात्रवृत्ति योजनाएँ बढ़ाई गईं। अब बच्चों के हाथ में किताबें हैं, न कि बंदूकें। यह परिवर्तन आने वाले वर्षों में स्थायी शांति की आधारशिला बनेगा।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सबसे बड़ी चुनौती रही है विश्वास की कमी। वर्षों तक ग्रामीण प्रशासन से दूर रहे, लेकिन अब 'जन संवाद' कार्यक्रमों, ग्राम सभाओं और जनकल्याण शिविरों के माध्यम से प्रशासन सीधे जनता से जुड़ रहा है। आधार, राशन कार्ड, पेंशन, वनाधिकार पट्टा और बैंकिंग सुविधाएं गांव-गांव तक पहुंची हैं। इससे ग्रामीणों को यह एहसास हुआ कि सरकार उनके साथ है। विश्वास का यही पुनर्निर्माण 31 मार्च 2026 के लक्ष्य को संभव बनाता है।

नई शुरुआत और चुनौतियां
केंद्र और राज्य सरकार ने स्पष्ट रूप से यह लक्ष्य रखा है कि 31 मार्च 2026 तक बस्तर को नक्सलवाद से मुक्त कर दिया जाएगा। सुरक्षा अभियानों की तीव्रता, लगातार आत्मसमर्पण और घटती हिंसक घटनाएं इस दिशा में सकारात्मक संकेत देती हैं। हालांकि 'नक्सल मुक्त' का अर्थ केवल हथियारबंद गतिविधियों का समाप्त होना नहीं है। इसका अर्थ है-भय का अंत, स्थायी शांति, न्याय और विकास की निरंतरता, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर और आदिवासी संस्कृति का सम्मान। इसलिए 31 मार्च 2026 केवल एक तिथि नहीं, बल्कि परिवर्तन की घोषणा है। बस्तर में नक्सलवाद खात्मे के साथ ही सरकार के सामने कई चुनौतियां भी आएंगी। दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्र, जिनमें  कुछ जंगल क्षेत्र अभी भी पूर्ण नियंत्रण में लाने की प्रक्रिया में हैं। युवाओं के लिए दीर्घकालिक रोजगार की जरूरत है। विकास योजनाओं में स्थानीय परंपराओं और आदिवासी पहचान का सम्मान जरूरी है। सुरक्षा और संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। यदि इन पहलुओं पर सतत ध्यान दिया गया, तो नक्सलवाद का पुनरुत्थान संभव नहीं होगा।
बस्तर की पहचान उसकी समृद्ध आदिवासी संस्कृति, लोककला, नृत्य और त्योहारों से है। नक्सलवाद के कारण इन परंपराओं पर भी असर पड़ा था। अब जब शांति लौट रही है, तो सांस्कृतिक उत्सव, बस्तर दशहरा और लोककलाओं का पुनर्जीवन नई ऊर्जा के साथ हो रहा है। यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण सामाजिक समरसता को मजबूत करेगा। यदि 31 मार्च 2026 तक बस्तर नक्सल मुक्त हो जाता है, तो यह केवल छत्तीसगढ़ की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि पूरे देश के लिए उदाहरण बनेगा। यह दिखाएगा कि वर्षों पुरानी नक्सल समस्या का समाधान केवल बंदूक से नहीं, बल्कि विकास, संवाद और विश्वास से संभव है। यह मॉडल अन्य प्रभावित क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा।

भय से विश्वास तक की यात्रा
बस्तर की कहानी संघर्ष से समाधान तक की यात्रा है। जिन जंगलों में कभी गोलियों की आवाज गूंजती थी, वहां आज विकास की गूंज सुनाई दे रही है। यदि यह लक्ष्य पूरी तरह साकार होता है, तो एक नई शुरुआत होगी। यह याद रखना होगा कि नक्सल मुक्त होना अंत नहीं, बल्कि नई जिम्मेदारी की शुरुआत है। शांति को बनाए रखना, विकास को समावेशी बनाना और आदिवासी अस्मिता का सम्मान करना ही स्थायी समाधान की कुंजी है। बस्तर अब भय की पहचान से बाहर निकलकर विश्वास, विकास और समृद्धि की पहचान बनाने की ओर अग्रसर है। यदि वर्तमान प्रयास निरंतर और संतुलित रूप से चलते रहे, तो 31 मार्च 2026 केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि नए युग का आरंभ सिद्ध होगा, जहां बस्तर न केवल नक्सल मुक्त होगा, बल्कि आत्मनिर्भर, सुरक्षित और विकसित भी होगा।