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शंकर चंद्राकर, वरिष्ठ पत्रकार

छत्तीसगढ़ का नक्सलवाद से मुक्त होना नि:संदेह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। दशकों तक हिंसा, भय और अस्थिरता से जूझने के बाद राज्य ने सुरक्षा, विकास और जनसहभागिता के समन्वित प्रयासों से एक कठिन संघर्ष को पार किया है, परंतु किसी भी संघर्ष का अंत केवल एक पड़ाव होता है, मंजि़ल नहीं। असली परीक्षा अब शुरू होगी यानी शांति को स्थायी बनाना, विकास को समावेशी बनाना और समाज में विश्वास की जड़ों को गहरा करना। नक्सलवाद से मुक्ति के बाद छत्तीसगढ़ के सामने कई सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और मनोवैज्ञानिक चुनौतियां खड़ी हैं। यदि इनका समुचित समाधान नहीं किया गया, तो असंतोष की नई परतें जन्म ले सकती हैं, इसलिए यह समय आत्मसंतोष का नहीं, बल्कि दूरदर्शी नीति और संवेदनशील शासन का है।

किसी भी उग्रवाद के समाप्त होने के बाद सबसे बड़ी चुनौती संघर्ष पश्चात बेहतर शासन की होती है। वर्षों तक संघर्षग्रस्त रहे क्षेत्रों में प्रशासनिक ढांचा कमजोर हो जाता है। कई गांवों में सरकारी उपस्थिति सीमित रही थी। अब आवश्यक है कि शासन की सक्रिय और संवेदनशील मौजूदगी हर स्तर पर महसूस हो। सिर्फ पुलिस कैंप और पुनर्वास केंद्र खोल देना पर्याप्त नहीं है। स्कूलों का नियमित संचालन, स्वास्थ्य केंद्रों की कार्यक्षमता, राशन व्यवस्था की पारदर्शिता और पंचायतों की सक्रियता-इन सबका निरंतर मूल्यांकन जरूरी है। यदि शासन की पहुंच कमजोर हुई, तो खाली स्थान को असंतोष भर सकता है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बेरोजगारी और सीमित आजीविका के अवसर लंबे समय से समस्या रहे हैं। युवाओं को यदि स्थायी रोजगार नहीं मिला, तो वे निराशा की ओर बढ़ सकते हैं। 

छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से समृद्ध है, परंतु संसाधनों के दोहन और स्थानीय हितों के संतुलन में सावधानी बरतनी होगी। उद्योगों के विस्तार से पहले स्थानीय युवाओं को कौशल प्रशिक्षण और रोजगार में प्राथमिकता देना आवश्यक है। कृषि, वनोपज, हस्तशिल्प और लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। तेंदूपत्ता, महुआ, साल बीज और अन्य लघु वनोपज के मूल्य संवर्धन से आदिवासी परिवारों की आय बढ़ सकती है। यदि आर्थिक विकास का लाभ सीधे स्थानीय समुदायों तक नहीं पहुंचा, तो विकास की धारणा खोखली साबित होगी। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कई वर्षों तक शिक्षा व्यवस्था बाधित रही। स्कूल भवनों को नुकसान पहुंचा, शिक्षक अनुपस्थित रहे और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई। अब जरूरी  है कि नक्सल प्रभावित रहे पूरे क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उपलब्धता सुनिश्चित हो। आदिवासी बच्चों के लिए मातृभाषा आधारित प्रारंभिक शिक्षा, डिजिटल साक्षरता, खेल और कौशल विकास कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान देना होगा। उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति और मार्गदर्शन तंत्र मजबूत करना भी आवश्यक है। शिक्षा ही वह माध्यम है जो हिंसा की वैचारिक जमीन को स्थायी रूप से कमजोर कर सकती है। दूरस्थ इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं लंबे समय तक अपर्याप्त रहीं। कुपोषण, मातृ मृत्यु दर और संक्रामक रोग जैसी समस्याएं गंभीर रही हैं।

शांति के बाद स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करना प्राथमिकता होनी चाहिए। मोबाइल मेडिकल यूनिट, टेलीमेडिसिन और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती से सुधार संभव है। साथ ही, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा, ताकि कमजोर वर्गों को समय पर सहायता मिल सके। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र मुख्य रूप से आदिवासी बहुल है। विकास की प्रक्रिया में यह सुनिश्चित करना होगा कि स्थानीय संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक संरचना का सम्मान बना रहे।

सिर्फ  बुनियादी ढांचा खड़ा कर देना विकास नहीं है। ग्राम सभाओं की भूमिका मजबूत करना, वनाधिकार कानून का प्रभावी क्रियान्वयन और प्राकृतिक संसाधनों पर समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है। यदि विकास स्थानीय संवेदनशीलताओं की अनदेखी करेगा, तो वह विश्वास अर्जित नहीं कर पाएगा। कई पूर्व नक्सली अब मुख्यधारा में लौट चुके हैं। उनके पुनर्वास की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उन्हें सम्मानजनक जीवन और स्थायी रोजगार मिल सके। सामाजिक पुनर्संयोजन की प्रक्रिया आसान नहीं होती। समुदाय में विश्वास बहाली, कौशल प्रशिक्षण और मनोवैज्ञानिक परामर्श जैसे कदम आवश्यक हैं। यदि पुनर्वास अधूरा रहा, तो यह असंतोष को जन्म दे सकता है।

नक्सलवाद का एक कारण प्रशासनिक उपेक्षा और भ्रष्टाचार की धारणा भी रही है। शांति के बाद यह अनिवार्य है कि शासन पारदर्शी और जवाबदेह बने। ई-गवर्नेंस, सामाजिक मूल्यांकन और जनसंवाद कार्यक्रमों के माध्यम से जनता और प्रशासन के बीच की दूरी कम की जा सकती है। लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना और स्थानीय नेतृत्व को अवसर देना भी दीर्घकालिक स्थिरता के लिए आवश्यक है। हालांकि सशस्त्र गतिविधियां समाप्त हो चुकी हों, परंतु सुरक्षा सतर्कता को पूरी तरह शिथिल नहीं किया जा सकता। सीमावर्ती क्षेत्रों और अंतरराज्यीय संपर्कों पर निगरानी बनाए रखना आवश्यक है। सुरक्षा बलों की भूमिका अब केवल अभियान तक सीमित नहीं, बल्कि सामुदायिक विश्वास निर्माण की भी होनी चाहिए। सुरक्षा और सेवा का संतुलन ही दीर्घकालिक शांति सुनिश्चित करेगा। वर्षों तक हिंसा झेलने वाले समाज में भय और अविश्वास की मानसिक छाप रहती है। बच्चों और युवाओं पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा है। सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं, युवा शिविर और सामुदायिक उत्सव सामाजिक पुनर्निर्माण में मदद कर सकते हैं। हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार ने इस दिशा में गंभीर प्रयास करना शुरू कर दिया है। इसी के तहत अब बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। वहीं क्षेत्र के विकास को रफ्तार देने के लिए 'नियद नेल्लानार' जैसी परियोजना भी बस्तर संभाग के सभी जिलों में चलाई जा रही है। समाज को यह महसूस होना चाहिए कि अब भविष्य संभावनाओं से भरा है, भय से नहीं। 

नक्सलवाद से मुक्ति के बाद छत्तीसगढ़ के सामने औद्योगिक और निवेश के नए अवसर खुलते हैं, परंतु निवेश और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन आवश्यक है। हर परियोजना में स्थानीय भागीदारी और पर्यावरणीय संवेदनशीलता सुनिश्चित करना दीर्घकालिक विकास के लिए अनिवार्य है। अन्यथा विकास और विस्थापन के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। नक्सलवाद से मुक्त छत्तीसगढ़ आज एक नए मोड़ पर खड़ा है। यह उपलब्धि सुरक्षा बलों के साहस, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जनता के धैर्य का परिणाम है, परंतु असली चुनौती अब शुरू होती है-शांति को स्थायी और विकास को समावेशी बनाना। यदि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सांस्कृतिक सम्मान और पारदर्शी शासन पर समान रूप से ध्यान दिया गया, तो यह राज्य संघर्ष की छाया से निकलकर प्रगति का मॉडल बन सकता है। नक्सलवाद का अंत इतिहास का एक अध्याय है। भविष्य का अध्याय इस बात पर निर्भर करेगा कि छत्तीसगढ़ अपने नागरिकों को कितना अवसर, सम्मान और विश्वास दे पाता है। शांति केवल बंदूक की खामोशी नहीं होती, शांति वह स्थिति है, जहां हर नागरिक को न्याय, अवसर और सम्मान का अनुभव हो। छत्तीसगढ़ के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा अवसर है।