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मुंबई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के दौरे के वक्त कानपुर जिस तरह सुलगा, उससे हर कोई हैरान है। हर शख्स अब प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है कि आखिर पुलिस क्या कर रही थी? 

क्यों वक्त रहते दंगाइयों को रोका नहीं गया? क्या सिस्टम वाकई नकारा हो गया है? कानपुर में हुई हिंसा पहला ऐसा मामला नहीं है। इससे पहले उत्तर-पूर्व दिल्ली में भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे के वक्त जमकर हिंसा हुई थी, जिसके पीछे सीएए-एनआरसी के विरोध का हवाला दिया गया था।

क्या आप जानते हैं कि इस तरह की हिंसक घटनाओं को बॉलीवुड ने काफी बेहतरीन तरीके से बड़े पर्दे पर उतारा है। कई फिल्में तो ऐसी हैं, जो दंगे के दौरान बने हालात से बेहद करीब से रूबरू कराती हैं। वहीं, कुछ फिल्मों की कहानी तो आपकी रूह भी कंपा देगी। कानपुर हिंसा के मद्देनजर हम आपको उन फिल्मों से रूबरू करा रहे हैं, जिन्होंने देश में हुए दंगों को काफी करीब से दिखाया।

बॉम्बे (1995)
मणिरत्नम द्वारा बनाई गई यह फिल्म हिंदू-मुस्लिम दंगों पर आधारित थी। दरअसल, 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद पूरे देश में दंगे हुए थे, जिसकी आंच इस फिल्म में दिखाई गई। साथ ही, उस वक्त के हालात से भी रूबरू कराया गया। 

अर्थ (1998)
कनैडियन फिल्ममेकर दीपा मेहता की यह फिल्म भी भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दर्द से रूबरू कराती है। दरअसल, इस फिल्म में एक पारसी परिवार की मार्मिक कहानी दिखाई गई थी, जो भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद वह इस भंवर में उलझ जाता है कि वह भारत का साथ दे या पाकिस्तान का। 

गदर: एक प्रेम कथा (2001)
यह फिल्म भारत-पाकिस्तान विभाजन पर आधारित है। इसमें 1947 के दौरान हुए दंगों को बखूबी दिखाया गया, जिसमें उस दौर से जूझने वालों की दास्तां सुनाई गई। इस फिल्म में बंटवारे के दौरान अपने परिवार से बिछड़ी एक मुस्लिम लड़की सकीना की कहानी दिखाई गई, जिसे हिंदुस्तान का सिख लड़का तारा सिंह दंगाइयों से बचाता है और सहारा देता है। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कई रिकॉर्ड कायम किए थे। 

मिस्टर एंड मिसेज अय्यर (2002)
अपर्णा सेन की यह फिल्म हिंदू-मुस्लिम दंगे पर आधारित है, जिसमें मुस्लिम फोटोग्राफर और हिंदू लड़की की कहानी दिखाई गई। दरअसल, मुस्लिम फोटोग्राफर और हिंदू लड़की अन्य मुसाफिरों के साथ एक बस में सफर कर रहे होते हैं। वहीं, बस के बाहर पूरा देश हिंदू-मुस्लिम दंगों से जूझता दिखाया गया। 

ब्लैक फ्राइडे (2007)
1993 के बॉम्बे (अब मुंबई) ब्लास्ट पर आधारित यह फिल्म बम धमाकों और दंगों की त्रासदी को बखूबी दिखाती है। दरअसल, इस फिल्म का प्लॉट भी 1992 के बाबरी विध्वंस पर आधारित है, जिसकी वजह से पूरा देश थरथरा गया था। 

फिराक (2008)
साल 2002 के दौरान गुजरात के गोधरा में हुए दंगों के आधार पर इस फिल्म को तैयार किया गया था। दरअसल, उन दंगों में काफी लोग बुरी तरह प्रभावित हुए थे, जिसमें हिंसा को काफी करीब से दिखाया गया था। 

दिल्ली-6 (2009)
इस फिल्म में भी हिंदू-मुस्लिम के बीच हुए सांप्रदायिक दंगों को दिखाया गया था, लेकिन इसका प्लॉट 'काला बंदर' पर आधारित था। दरअसल, काला बंदर को लेकर एक वक्त पर पूरे देश में काफी ज्यादा अफवाह थी। इस फिल्म में दिखाया गया था कि कैसे यह अफवाह दो समुदायों के बीच तनाव की वजह बन गई।