0 2021 का कार्यालय ज्ञापन किया रद्द
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को फैसला सुनाया कि केंद्र सरकार केवल पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा तीन के तहत वैध कानूनी अधिसूचना जारी करने के बाद ही कार्योत्तर पर्यावरण मंज़ूरी की अनुमति दे सकती है। वह केवल एक साधारण प्रशासनिक कार्यालय ज्ञापन के माध्यम से ऐसी स्वीकृतियां नहीं दे सकती है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने तदनुसार केंद्र सरकार के वर्ष 2021 के कार्यालय ज्ञापन को निरस्त कर दिया जिसने उन परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृति प्रदान करने के लिए एक तंत्र स्थापित किया था, जिन्होंने पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त किए बिना ही अपना काम शुरू कर दिया था।
न्यायालय ने अपना फ़ैसला भविष्य के लिए लागू किया और 2021 के कार्यालय ज्ञापन के तहत पहले से दी गई पर्यावरण मंज़ूरी को बरकरार रखा। बेंच ने माना कि 2021 का कार्यालय ज्ञापन, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के नियमों के ख़िलाफ़ था, क्योंकि इसमें वैधानिक अधिसूचना के बजाय प्रशासनिक आदेश द्वारा पर्यावरण मंज़ूरी की प्रक्रिया में बदलाव करने की कोशिश की गई थी।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि 2006 की अधिसूचना के तहत पहले से पर्यावरण मंज़ूरी लेना आवश्यक है लेकिन केंद्र सरकार एक वैध कानूनी अधिसूचना द्वारा कार्योत्तर मंज़ूरी की एक सीमित योजना ला सकती है।