0 ओबीसी क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, केंद्र सरकार की याचिका खारिज
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने यूपीएसी परीक्षाओं में ओबीसी क्रीमी लेयर आरक्षण पर केंद्र सरकार की संशोधन याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि ओबीसी आरक्षण के तहत ‘क्रीमी लेयर’ तय करने का आधार केवल माता-पिता की सैलरी या आय को नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी उम्मीदवार को आरक्षण के दायरे से बाहर करने के लिए केवल वेतन को पैमाना मानना सही नहीं है। इसके लिए माता-पिता के सोशल स्टेटस और उनके पद की प्रकृति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
केंद्र सरकार को दो साल का वक्त देने से इनकार
केंद्र ने पीएसयू (सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों) और प्राइवेट सेक्टर की नौकरियों के पदों की सरकारी पदों से समानता तय करने और नई व्यवस्था बनाने के लिए दो साल का समय मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने यह मांग स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने फैसले का पालन करने के लिए आठ हफ्ते का अतिरिक्त समय दे दिया है।
ओबीसी क्रीमी लेयर का क्या है मामला
0 यह पूरा विवाद उन कैंडिडेट्स से जुड़ा है, जिनके माता-पिता पब्लिक सेक्टर्स (पीएसयू), बैंक या इसी तरह के संस्थानों में काम करते थे। इन कुछ कैंडिडेट्स ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) में याचिका दायर की थी। वे सिविल सेवा परीक्षा में ओबीसी (नॉन क्रीमी लेयर) का लाभ चाहते थे। ट्रिब्यूनल ने सरकार को आदेश दिया था कि उन्हें उनके ओबीसी श्रेणी के आरक्षण के आधार पर नौकरी दी जाए।
0 केंद्र सरकार ने 1993 का ऑफिस मेमोरेंडम (ओएम) जारी किया था, जिसमें बताया गया था कि ओबीसी में क्रीमी लेयर कौन होगा। उसमें कहा गया था कि वेतन और कृषि आय को आय सीमा तय करने में शामिल नहीं किया जाएगा। लेकिन 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण में पीएसयू और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन-आय को शामिल करने की बात कही गई थी।
0 सरकार ने इस स्पष्टीकरण पत्र का सहारा लेकर कैंडिडेट्स के माता-पिता की सैलरी को आय में जोड़ दिया था। इस वजह से कैंडिडेट्स को आरक्षण का फायदा नहीं मिला था।
कोर्ट ने कहा था - एक पत्र मुख्य नीति को नहीं बदल सकता
कोर्ट ने इसी साल 14 मार्च को हुई सुनवाई में कहा था कि 2004 का एक पत्र मुख्य नीति को नहीं बदल सकता।सरकारी कर्मचारियों और पीएसयू कर्मचारियों के बीच भेदभाव करना गलत है। अगर सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को पद के आधार पर छूट मिलती है, तो पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों को केवल सैलरी के आधार पर आरक्षण से बाहर करना समानता के अधिकार का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया था कि वह 6 महीने के भीतर इन कैंडिडेट्स के दावों पर फिर से विचार करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर जरूरी हो तो इन कैंडिडेट्स को नौकरी देने के लिए अलग से पद बनाए जाएं।