दीपेंद्र तिवारी
आज के हालात को देखकर लगता है कि न जाने ये समय इतना कठिन, इतना बेरहम और इतना निर्दयी क्यों हो गया है। हालांकि समय की इस क्रूरता के पीछे कभी न कभी, कहीं न कहीं रहा मानव ही है। समय से मानव कभी नहीं जीत सका है, पर समय को जीतने के मद में वो प्रकृति से जाने-अनजाने बैर जरूर मोल लेता रहा है। शायद इसीलिए इस बैर के परिणाम इतने भयावह हैं कि आज मनुष्य स्वंय को एक वायरस के सामने इतना असहाय, भयभीत और सहमा हुआ महसूस कर रहा है।
कोरोना महामारी के तांडव को देख मानव के सर्वश्रेष्ठ और सर्व शक्तिमान होने का दंभ भी शायद चकनाचूर हो चुका है और यदि नहीं हुआ होगा तो भविष्य में इससे भयंकर परिणाम भुगतने के लिए उसे तैयार रहना चाहिए। आज मनुष्य प्रकृति से किए खिलवाड़ पर पश्चताप और विलाप कर रहा है, पर कहीं इस विपदा से उबरने के बाद उसका ये पश्चाताप और आंसु केवल दिखावा तो साबित नहीं होंगे। यदि प्रकृति के प्रति आज भी मनुष्य के मन में कपट है तो भविष्य के उज्ज्वल होने की कल्पना करना व्यर्थ है। उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रकृति प्रेमी होने का संकल्प करने मात्र से इतिश्री नहीं होगी, बल्कि इसे मनसा, वाचा और कर्मणा में आत्मसात् करना जरूरी है। मानव समाज इस वाक्य को जितना जल्दी आत्मसात करेगा उसे उतना ही अच्छा है।
प्रकृति ने मानव को उसके प्रति की जा रही क्रूरता छोडऩे के लिए कई दफा छोटी-बड़ी आपदाओं के रूप में चेताया और शायद कुछ समय के लिए मानव चेत भी गया। पर मनुष्य ने अपने भूलने और गलती करने के स्वभाव को दोहराते हुए प्रकृति से छेड़छाड़ पुन: शुरू कर दी। प्रकृति से द्वेष रखने के परिणाम स्वरूप ही सुनामी और केदारनाथ जैसी आपदाएं आई, लेकिन मनुष्य ने सबक नहीं लिया. इसीलिए ही सूखा, अतिवृष्टि, तूफान, अकाल, भूकंप, महामारी और बाढ़ जैसी आपदाएं प्रकृति का कोप बन मानव समाज पर कहर ढा रही हैं। इतिहास में दर्ज प्राकृतिक आपदाओं की बात करें तो साल 1770 में करीब 1 करोड़ लोगों की बंगाल के अकाल में मौत हो गई थी। उत्तरी हिंद महासागर में वर्ष 1999 में 260 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से आए सुपर साइक्लोन ने करीबन 15 हजार जाने ले लीं थी। साल 2013 में केदारनाथ में प्रकृति ने अपना ऐसा रोद्र रूप दिखाया कि लगातार भारी वर्षा और भू-स्खलन के कारण करीबन तकरीबन 50 हजार से से ज्यादा लोग काल कलवित हो गए। एक तरह से यह सरकारी आंकड़ा है, जबकि जमीन पर हालात कैसे होंगे यह तो सोचने का विषय है। हर साल मुंबई में आने वाली बाढ़, अलग-अलग क्षेत्रों में आने वाले भूकंप, महामारी और न जाने कितनी ही आपदाएं मानव के दृष्टिहीन विकास की बली चढ़ रही प्रकृति का ही श्राप हैं। आज मानव सभ्यता के लिए अभिशाप बन चुका कोरोना भी संभवत: मनुष्य की ऐसी ही किसी गलती का दुष्परिणाम हो। कोरोना काल से उबरने के बाद मानव को ये सीख तो लेनी ही चाहिए कि प्रकृति के प्रति द्वेष कैसे उसके आसमान छूते विकास के दंभ को एक ही झटके में धराशायी कर देता है। दरअसल, कोरोना को लेकर अलग-अलग तरह के दावे सामने आते रहे हैं। पहले इसे बायोवेपन माना जा रहा था और मैनमेड वायरस बताया जा रहा था। खास बात यह है कि हाल ही में ऑस्ट्रेलिया व अमेरिकी सरकारों ने इसे चीनी का ही जैविक हथियार माना है, लेकिन क्या यह उतना सच है। यह तो आने वाला समय ही बताएगा और यह सच साबित होता है तो यह भी प्रकृति के जीवन चक्र में मनुष्य का सीधा हस्तक्षेप होगा और इसके परिणाम भी घातक ही सिद्ध होंगे।
दूसरी ओर से देखा जाए तो खान-पान, रहन-सहन और जीवन जीने की संस्कृति में बदलाव, ना खाने योग्य खाना, जैविक पारिस्थितिक तंत्र से छेड़छाड़ के नतीजों ने कोरोना वायरस जैसी महामारी को जन्म दिया है। चीन के वुहान में चमगादाड़ के भीतर पाए जाने वाले इस वायरस ने पूरी दुनिया को तहस-नहस कर दिया है। गौर करने वाली बात है कि चीन में वुहान स्थित जैविक प्रयोगशाला जहां संदेह के घेरे में रही है वहीं यहां का एनिमल मार्कैट पूरी दुनिया में एक विभत्स और मनुष्य की सबसे अलग प्रवृत्ति के कारण चर्चा में रहा है। बहरहाल, यदि यह वायरस जानवरों से फैला है प्रकृति के कहर का यह चक्र निकट भविष्य में मिटने के आसार तो नजर नहीं आ रहे।
देखने वाली बात यह है कि कैसे एक छोटे से वायरस के सामने उसके आसमान छूते मेडिकल साइंस ने घुटने टेक दिए हैं, कैसे विकास का पैमाना मानी जाने वाली कंक्रीट से बनीं इमारतें एक बीमारी के सामने खोखली नजर आ रही हैं, कैसे विकास के नाम पर काटे गए वृक्षों ने ऑक्सीजन के लिए मानव को उसकी औकात दिखा दी है। ऐसे कितने की सवाल हैं जिनके उत्तर मनुष्य को खुद के सुरक्षित भविष्य के लिए तलाशने होंगे अंत में केवल इतना कि मनुष्य प्रकृति का विरोध कर अपने लिए विकास का जो रास्ता बना रहा है, वह उसे केवल विनाश की ही ओर ले जाएगा।