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अहमदाबाद। मानव के मन के पास अनंत शक्तियां हैं। वह पहले श्रवण की क्रिया करता है फिर चिंतन करके मनन करता है। श्रवण याने सुनना। किसी भी बात को ध्यान से सुनना है फिर उस पर चिंतन याने जो सुना है उस पर बार बार विचार करना है उसके बाद मनन की प्रक्रिया चलती है जो विचार किया उस पर सुंदर काम होता है। विचारक लोग मन की शक्ति का उपयोग सही ढंग से करते है। जो सुना उस पर चिंतन-मनन करके कितने लोग नये नये ग्रंथों की रचना करते है। मन की शक्ति में विचार करने की शक्ति है, चिंतन मनन करने की शक्ति है जो व्यक्ति इसका उपयोग कर लेता है उसका काम बन जाता है। कितने तो महान बन गए।
अहमदाबाद में बिराजित प्रखर प्रवचनकार, संत मनीषि, गच्छाधिपति प.पू.आ.देव राजयश सूरीश्वरजी महाराज श्रोताजनों को संबोधित करते हुए सूरीश्वरजी महाराजा श्रोताजनों को संबोधित करते हुए फरमाते है।    आर्यरहित नाम के पंडित बारह वर्षों के बाद अपना अभ्यास पूरा करके घर लौटे। गां के लोगों ने खूब ही उत्साह के साथ आर्यरक्षित का सामैया पूर्वक स्वागत किया। आर्यरक्षित देख रहे है पूरा गांव उसका स्वागत करने आया है मगर इन लोगों के बीच उन्हें अपनी मां नहीं दिखी। मां की खोज करते हुए वे अपने घर पहुंचे। मां सामायिक लेकर बैठी थी और कुछ नाराज नजर आ रही थी। मन में चिंतन चला। लोग मेरे अभ्यास से खुश है लेकिन मां खुश क्यों नहीं है। तब आर्यरक्षित से अपनी मां से नाराजगी का कारण पूछा? मां कहती है बेटा, तुं चौद विधा का अभ्यास करके आया है लेकिन तुने पूर्व का अभ्यास नहीं किया? आत्मा का अभ्यास नहीं किया? मां की खुशी के लिए आर्यरक्षित, पूर्व का ज्ञान मिलाने आर्यसुहस्ती गुरू के पास गए। ज्ञान मिलाकर वे शासन के शिरताज बनें।
हरेक चीज को मन के कार्य में लगाओंगे सुन्दर समाधान एवं सुंदर मार्ग मिलेंगे। पूज्यश्री फरमाते है महापुरूषों के वचनों का श्रवण करके उस पर आप भी चिंतन-मनन करोंगे आपके लिए भी मार्ग खुल्ले हो जाएगे।
उत्तराध्ययन सूत्र के सम्यक्त्व पराक्रम अध्ययन में प्रश्न आया संभोग पच्चक्खाण से जीव क्या प्राप्त करता है? गृहस्थ के जिस पर कई तरह के रिवाज होते है इसी तरह साधु के भी अनेक प्रकार के रिवाज होते है। जो साधु अन्य साधुओं की सहाय लेते है, अन्य साधुओं के साथ आहार करते है, दूसरों का लाया हुआ पानी का उपयोग करते है वे संभोग साधु कहलाते है। जिसमें आत्म विश्वास आता है तथा जो एकांत की साधना करना चाहता है वह साधु मन में तय करता है कि मेरी आवश्यकता के लिए अन्य को कष्ट नहीं देना है। साधु चर्या के पालन दरम्यान वह साधु पच्चक्खाण करता है कि मुझे किसी दूसरे साधु की सहाय नहीं लेनी है मेरी गोचरी मैं स्वयं लाऊगां इसी तरह मेरा पानी भी मैं खुद ही लाऊंगा इस प्रकार का सात्विक विचार करता है। जो कुछ करूंगा मेरे अपने पैरों पर खड़े होकर ही कार्य करूंगा।
एक सौ वर्ष की वृद्ध स्त्री। परिवार वाले उस वृद्ध स्त्री की सेवा में खड़े रहते है तब वह वृद्ध स्त्री मेरा काम मुझे स्वयं करने दो। परिवार वाले कहते है दादीजी आपकी सेवा करने का मौका दो तब दादीजी फरमाते है मेरी सेवा का लाभ देने में मुझे कोई हर्ज नहीं परंतु जब मैं संपूर्ण तरीके से काम करना छोड़ दूंगी तो मेरे हाथ पैर चलने बंद हो जाएगें। तकलीफ मुझे ही होगी इसलिए मेरा काम मुझे ही करने दो।
पू्ज्यश्री फरमाते है शरीर से श्रम कराते वक्त सहन करते रहना। जो शरीर को श्रम नहीं देता है उसे पिछली जिंदगी में भयंकर दु:ख सहन करना पड़ता है। हमारा शरीर एक प्रकार का मशीन है। रोज उस मशीन का उपयोग करने में न आए तो काट लग जाएगा रोज उपयोग में लोगे तो मशीन घिस जरूर जाएगी परंतु काम करने के बाद घिसेगी। इसी तरह हमारा शरीर भी घिस जाए तो ठीक है परंतु अनुपयोगी बनेगा तो नहीं चलेगा। 
कभी जीवन को पराधीन नहीं बनाना। पराधीन बनने वालों को दूसरों से प्रार्थना करनी पड़ती है। खुद के काम के लिए दूसरों की राह देखनी पड़ती है। किसी के शिष्य-शिष्या परिवार ज्यादा हो शिष्य शिष्या मेरी सेवा करेगी ऐसी आशा रखनी नहीं। कोई सेवा की भावना से करने आए तो उसका अपमान नहीं करना परंतु उसे समझाकर कहना कि तुम्हारी भावना की मैं अनुमोदना करता हूं परंतु मुझे मेरा जीवन स्वावलंबी बनकर जीना है। प्रभु महावीर जब मरीचि के भव में बिमार पड़े तब मन में इच्छा की कि मेरी भी कोई सेवा करे ऐसा शिष्य चाहिर शिष्य की इच्छा में उत्सूत्र प्ररूपणा की। आखिर में उन्हें शिष्य तो मिला परंतु उनका अनंत संसार बढ़ गया। मोक्ष साथक हरेक आत्मा को अपनी साधना में स्वाधीन बनना शक्य हो तो संभोग पच्चक्खाण जरूर करना पर की आशा सदा निराशा अपना काम अपने हाथों करके निरालंबन जीवन जीकर शीघ्र आत्मा से परमात्मा बनें।