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नई दिल्ली।  उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें एक तलाक के मामले की नए सिरे से सुनवाई करने को कहा गया था। यह मामला इसलिए चर्चा में आया क्योंकि एक परिवार न्यायालय ने तलाक की मंजूरी देते समय कानून की ऐसी धारा का इस्तेमाल कर दिया था, जो असल में है ही नहीं।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसने पुराने तलाक को रद्द कर नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया था। फिलहाल उच्चतम न्यायालय ने इस दोबारा सुनवाई पर रोक लगा दी है।

पूरा मामला तब उलझ गया जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने पाया कि परिवार न्यायालय के न्यायाधीश ने अलग-अलग कानूनों को आपस में मिला दिया था। केस हिंदू मैरिज एक्ट के तहत दर्ज था, लेकिन न्यायालय ने विशेष विवाह अधिनियम (स्पेशल मैरिज एक्ट) की एक ऐसी धारा का जिक्र कर दिया जो कानून की किताब में मौजूद ही नहीं है। इन कानूनी गलतियों की वजह से उच्च न्यायालय ने पूरे मामले को शुरू से सुनने का निर्देश दिया था। अब उच्चतम न्यायालय ने इस बात की जांच करेगा कि क्या इस मामले में दोबारा सुनवाई की जरूरत है या नहीं।

इस बीच, उस न्यायाधीश ने भी उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, जिन्होंने यह फैसला सुनाया था। उन्होंने उच्च न्यायालय द्वारा उनके खिलाफ की गई सख्त टिप्पणियों को हटाने की मांग की है। हालांकि, फरवरी में हुई पिछली सुनवाई में उच्चतम न्यायालय ने उन टिप्पणियों पर रोक लगाने से मना कर दिया था। अब इन सभी मुद्दों पर एक साथ विचार किया जाएगा।