0 बोर्ड और सभी स्टेट क्रिकेट संघों से मांगा जवाब, 2014 से चल रहा मामला
मुंबई। सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई और सभी राज्य क्रिकेट संघों से पूछा है कि उन्हें नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट, 2025 के दायरे में क्यों नहीं लाया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी पूछा कि इन संस्थाओं के पदाधिकारियों के कार्यकाल और सेवा शर्तों को इस कानून के तहत क्यों नहीं रखा जाए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मंगलवार को बीसीसीआई से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया। कोर्ट ने बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों के वकीलों से इस मुद्दे पर निर्देश लेकर जवाब देने को कहा है। बीसीसीआई से जुड़ा यह मामला 2014 से सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। इस दौरान बोर्ड के प्रशासन, संविधान, पदाधिकारियों के कार्यकाल और कामकाज से जुड़े कई मुद्दों पर सुनवाई हो चुकी है।
बीसीसीआई का क्या स्टैंड है?
बीसीसीआई लंबे समय से खुद को एक स्वतंत्र संस्था मानता रहा है। उसका तर्क है कि उसे सरकार से कोई ग्रांट नहीं मिलती, इसलिए उस पर नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस एक्ट लागू नहीं होना चाहिए। बीसीसीआई ने एक अन्य मामले में ओडिशा हाईकोर्ट के सामने यह भी कहा था कि कानून बनने के बावजूद क्रिकेट को अभी तक इस एक्ट के तहत लागू होने वाले डेजिगनेटेड स्पोर्ट्स के तौर पर नोटिफाई नहीं किया गया है। यानी बीसीसीआई का पक्ष मुख्य तौर पर दो बातों पर टिका है- उसे सरकारी फंड नहीं मिलता और क्रिकेट को एक्ट के तहत लागू करने के लिए जरूरी नोटिफिकेशन अभी नहीं हुआ है।
बीसीसीआई को लेकर सवाल क्यों उठता रहा है?
बीसीसीआई संविधान या संसद के किसी कानून से बनाई गई सरकारी संस्था नहीं है, बल्कि सोसायटी के तौर पर रजिस्टर्ड है। हालांकि, भारतीय क्रिकेट का संचालन उसी के हाथ में है। टीम चयन, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व और घरेलू क्रिकेट का संचालन जैसे महत्वपूर्ण काम बोर्ड करता है। इसी वजह से लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि इतने बड़े सार्वजनिक महत्व वाले खेल का संचालन करने वाली संस्था पर सरकारी खेल संस्थाओं जैसे नियम क्यों नहीं लागू होने चाहिए।
2013 में भी बीसीसीआई को कानून के दायरे में लाने की कोशिश
बीसीसीआई को खेल कानून और आरटीआई के दायरे में लाने की कोशिश नई नहीं है। 2013 में केंद्र सरकार ने नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट बिल का ड्राफ्ट तैयार किया था। इसका मकसद राष्ट्रीय खेल महासंघों के साथ बीसीसीआई को भी आरटीआई के दायरे में लाना था। हालांकि यह बिल कानून नहीं बन सका।
2014 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
बीसीसीआई के प्रशासन और कामकाज से जुड़े विवादों के बीच मामला 2014 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इसके बाद कोर्ट ने क्रिकेट बोर्ड में सुधार के लिए पूर्व सीजेआई आर.एम. लोढ़ा की अध्यक्षता में कमेटी बनाई। कमेटी को बीसीसीआई के कामकाज में सुधार के सुझाव देने और बोर्ड के लिए नया संविधान तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में उसकी सिफारिशों को स्वीकार किया।
2018 में बीसीसीआई के संविधान को मंजूरी
लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों के आधार पर बीसीसीआई के संविधान में कई बदलाव किए गए। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित संविधान को मंजूरी दी। इसके बाद बीसीसीआई के प्रशासन, पदाधिकारियों और चुनाव से जुड़े कई नियम कोर्ट की निगरानी और आदेशों के दायरे में आ गए।
2022 में कार्यकाल के नियम बदले
सितंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने बीसीसीआई के संविधान में पदाधिकारियों के कार्यकाल से जुड़ा बदलाव मंजूर किया। इसके तहत कोई पदाधिकारी राज्य क्रिकेट संघ और बीसीसीआई में मिलाकर कुल 12 साल तक लगातार पद पर रह सकता है। इसमें 6 साल राज्य संघ और 6 साल बीसीसीआई में शामिल हैं। इसके बाद 3 साल का कूलिंग-ऑफ पीरियड होता है। बीसीसीआई की मौजूदा व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट से मंजूर लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों पर आधारित है। इसके तहत पदाधिकारी लगातार दो टर्म पूरा करने के बाद कूलिंग-ऑफ पीरियड में जाता है।