0 भाजपा सांसद ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिख गिनाईं अड़चनें
नई दिल्ली। कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस) में ज्यादा पेंशन देने की प्रक्रिया में आ रही दिक्कतों का मामला अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंच गया है। राज्यसभा में भाजपा सांसद डॉ. अजीत माधवराव गोपछड़े ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस मामले से जुड़ी पुरानी उलझनों को दूर करने की मांग की है।
पत्र में उन्होंने कहा है कि सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सभी क्षेत्रों में लागू हो चुका है। इसके बावजूद हजारों रिटायर्ड कर्मचारी अभी भी देरी और कानूनी अड़चनों का सामना कर रहे हैं।
ईपीएस में पेंशन का पूरा हिसाब समझें
ईपीएफ के नियमों के मुताबिक, एम्प्लॉयर कर्मचारी की बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते (डीए) का 8.33 फीसदी हिस्सा ईपीएस में जमा करता है। अभी पेंशन के कैलकुलेशन के लिए अधिकतम वेतन 15,000 रुपये तय है। यानी हर महीने ईपीएस में ज्यादा से ज्यादा 1,250 रुपये जमा हो सकते हैं। अगर यह वेतन सीमा बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दी जाती है, तो ईपीएस में हर महीने जमा होने वाली रकम करीब 2,083 रुपये तक पहुंच सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने 4 नवंबर 2022 के अपने अहम फैसले में कर्मचारियों को वास्तविक वेतन यानी तय सीमा से ज्यादा वेतन पर भी ईपीएस में योगदान करने का अधिकार दिया था। इसका मकसद रिटायरमेंट के बाद ज्यादा पेंशन का फायदा देना था। हालांकि, कोर्ट के फैसले के बाद भी पात्र पेंशनरों में से बहुत कम लोगों को अब तक बढ़ी हुई पेंशन का फायदा मिल पाया है।
पत्र में उठाई गई पांच आपत्तियां
पहली आपत्ति प्रक्रिया में आ रही दिक्कतों को लेकर है। गोपछड़े ने श्रम मंत्रालय के मई 2023 के एक ज्ञापन का हवाला दिया है। इसमें मंत्रालय ने खुद ईपीएफ योजना के पैरा 26(6) को बड़ी अड़चन बताया था। इसके तहत कर्मचारी या एम्प्लॉयर को ज्यादा वेतन पर योगदान करने का विकल्प देना होता है और ईपीएफओ को इसकी मंजूरी देनी होती है।
मंत्रालय ने ईपीएफ आयुक्त को बताया था कि ईपीएफओ ने इसके लिए कोई तय फॉर्मेट नहीं बनाया था। साथ ही, उसके फील्ड ऑफिसों ने ज्यादा वेतन पर योगदान की मंजूरी भी नहीं दी। दूसरी ओर, कर्मचारी और एम्प्लॉयर इस दौरान ज्यादा वेतन के आधार पर पैसा जमा करते रहे। दूसरी आपत्ति संसद में दिए गए आश्वासन को लेकर है। सांसद के मुताबिक, 6 अगस्त 2026 को उनके सवाल के जवाब में सरकार ने सदन में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला छूट प्राप्त और छूट रहित, दोनों तरह के ट्रस्टों पर समान रूप से लागू किया गया है। यह संसदीय आश्वासन संख्या 271/72 के नाम से दर्ज है और अभी भी ‘लंबित’ है।
तीसरी आपत्ति अदालतों में लगातार पहुंच रहे मामलों को लेकर है। इस मुद्दे से जुड़े कई मामले हाईकोर्ट में पहुंच रहे हैं। इससे पता चलता है कि ट्रस्ट के नियमों और पुराने योगदान को लेकर अभी भी स्थिति पूरी तरह साफ नहीं है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सभी जगह एक समान तरीके से लागू किए जाने के सरकार के दावे पर भी सवाल उठते हैं। चौथी आपत्ति EPS-1995 की आर्थिक स्थिति को लेकर है। गोपछड़े ने योजना की आर्थिक व्यवस्था और पुराने योगदान के तरीके की पूरी समीक्षा करने की मांग की है। उनका कहना है कि इससे योजना को लंबे समय तक चलाने के साथ पेंशनरों की जायज मांगों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी।
पांचवीं आपत्ति अलग-अलग कंपनियों के ट्रस्टों में कथित भेदभाव को लेकर है। सार्वजनिक क्षेत्र की एक जैसी कंपनियों के रिटायर्ड कर्मचारियों को समान फायदा नहीं मिल रहा है। भेल और सेल के कुछ ट्रस्ट ज्यादा पेंशन दे रहे हैं, जबकि उन्हीं कंपनियों के दूसरे ट्रस्ट यह फायदा देने से इनकार कर रहे हैं। इससे रिटायर्ड कर्मचारियों के बीच असमंजस और परेशानी की स्थिति बनी हुई है।
पीएमओ से की गईं छह मांगें
सांसद ने प्रधानमंत्री कार्यालय से इस पूरे मामले की उच्च स्तर पर समीक्षा करने की अपील की है। इसके साथ उन्होंने छह अहम कदम उठाने की मांग की है:
0 ईपीएफ योजना के पैरा 26(6) की वजह से आ रही प्रशासनिक दिक्कतों को दूर किया जाए।
0 छूट प्राप्त और छूट रहित, दोनों तरह के प्रतिष्ठानों के पात्र आवेदकों के साथ समान व्यवहार किया जाए।
0 ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिससे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले सभी पात्र आवेदकों पर एक समान तरीके से लागू हों और उन्हें अलग-अलग मुकदमे लड़ने की जरूरत न पड़े।
0 ईपीएस-1995 में योगदान के मौजूदा ढांचे की समीक्षा कराई जाए।
0 ज्यादा पेंशन के सभी लंबित आवेदनों का तय समयसीमा के भीतर निपटारा किया जाए।
0 संसदीय आश्वासन संख्या 271/72 को पूरी तरह और पारदर्शी तरीके से लागू किया जाए।