
सन् 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध की प्रतीक अमर जवान ज्योति ज्वाला को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की ज्वाला से मिला दिया गया है। सरकार का मानना था कि इंडिया गेट पर जिन शहीदों-वीरों के नाम हैं, उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध और एंग्लो-अफगान युद्ध में अंग्रेजों के पक्ष में लड़ाई लड़ी थी, जबकि अमर जवान ज्योति बांग्लादेश की मुक्ति के लिए शहीद हुए वीरों की याद में है, अत: दोनों अलग-अलग हैं। इस लिहाज से औपनिवेशक काल के प्रतीक इंडिया गेट को स्वतंत्र रहने देना चाहिए और अमर जवान ज्योति को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में लाना एक लिहाज से सरकार का तर्कपूर्ण फैसला है। फिर भी अमर जवान ज्योति इंडिया गेट की पहचान रही है। इंडिया गेट के बीच अनवरत लगभग 50 वर्षों से यह ज्योति प्रज्ज्वलित थी, जिसे देखकर शहादत की भव्यता और गर्व की अनुभूति होती थी। कम से कम तीन पीढिय़ां ऐसी बीती हैं, जिनके लिए इंडिया गेट के साथ अमर जवान ज्योति के दर्शन का विशेष महत्व था। अब हमारी शान का एक प्रतीक इंडिया गेट तो वहां रहेगा, लेकिन ज्योति के दर्शन वहां नहीं, वहां से 400 मीटर दूर राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में होंगे।
सरकार के इस निर्णय पर बड़ी संख्या में पूर्व सैनिकों ने खुशी जताई है। आमतौर पर यही यथोचित है कि दिल्ली में एक ही स्थान पर ऐसी शहादत को समर्पित ज्योति रखी जाए। शहीदों के सम्मान में जब राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में ज्योति जलाई गई थी, तभी से भी इंडिया गेट की अमर जवान ज्योति पर चर्चा हो रही थी। यह संभव था कि राष्ट्रीय युद्धस्मारक का वजूद अलग रहता और इंडिया गेट पर पचास वर्षों से प्रज्ज्वलित ज्योति को यथावत रहने दिया जाता। खैर, यह सरकार का फैसला है और देश के शहीदों, वीरों के सम्मान पर किसी तरह के विवाद की कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए। यदि सेना को भी यही लगता है कि राष्ट्रीय युद्ध स्मारक ही एकमात्र स्थान है, जहां वीरों को सम्मानित किया जाना चाहिए, तो इस फैसले और स्थानांतरण का स्वागत है। इधर, सरकार ने एक और फैसला लिया है कि इंडिया गेट के पास नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित होगी। यह फैसला भी अपने आप में बड़ा है। अभी तक वहां किसी प्रतिमा के लिए कोई जगह नहीं थी, अब अगर जगह निकल रही है, तो आने वाली सरकारों को संयम का परिचय देना पड़ेगा। अलग-अलग सरकारों के अपने-अपने आदर्श रहे हैं और अलग-अलग सरकारों द्वारा अलग-अलग प्रकार के स्मारक बनाने का रिवाज भी रहा है। यही विचार की मूल वजह है। स्मारकों और प्रतिमाओं का सिलसिला सभ्य और तार्किक होना चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसे स्मारक देशवासियों को प्रेरित करते हैं और इससे देश को मजबूती मिलती है, लेकिन तब भी हमें राष्ट्रीय महत्व के कुछ स्मारकों को उनके मूल स्वरूप में ही छोड़ देने पर अवश्य विचार करना चाहिए। अब यह इतिहास है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 26 जनवरी, 1972 को अमर जवान ज्योति का उद्घाटन किया था और यह भी इतिहास है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 फरवरी, 2019 को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का उद्घाटन किया, जहां अब तक शहीद हुए देश के 25,942 सैनिकों के नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित हैं। अब अमर जवान ज्योति के आगमन से राष्ट्रीय युद्ध स्मारक का महत्व बहुत बढ़ गया है और बेशक, इससे राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र सेवा को बल मिलेगा।