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0 ईओडब्ल्यू की विशेष अदालत ने सुनाया फैसला 

रायपुर। सीजीएमएससी घोटाला प्रकरण में ईओडब्ल्यू-एसीबी ने बड़ी कार्रवाई की है। जांच एजेंसी ने 5 अफसरों को गिरफ्तार किया है। इन सभी को ईओडब्ल्यू की विशेष अदालत में पेश किया गया, जहां 7 दिनों की रिमांड मंजूर की गई है। ईओडब्ल्यू ने आरोपियों की 15 दिन की रिमांड मांगी थी। 

ईओडब्ल्यू ने दो आईएएस समेत सीजीएमएससी और हेल्थ विभाग के दर्जन भर अधिकारियों को तलब कर लंबी पूछताछ करने के बाद की 5 लोगों को देर रात गिरफ्तार किया था। इसके बाद शनिवार सुबह ईओडब्ल्यू की विशेष अदालत में पेश किया गया।  ईओडब्ल्यू की ओर से मामले की तह तक जाने के लिए आरोपियों की 15 दिन की पुलिस रिमांड मांगी थी। विशेष अदालत के न्यायधीश ने सुनवाई के बाद सात दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया। 
 
बता दें कि सीजीएमएससी के माध्यम से करीब 660 करोड़ के घोटाले की ईओडब्ल्यू-एसीबी जांच कर रही है। इस पूरे मामले में जांच एजेंसी ने सबसे पहले दवा सप्लायर कंपनी मोक्षित कार्पोरेशन के संचालक शशांक चोपड़ा को गिरफ्तार किया था, और अब अफसरों को घेरे में लिया गया है। बताया गया कि सभी अफसरों को पूछताछ के लिए शुक्रवार की शाम तलब किया गया था। इनमें प्रभारी जीएम बसंत कुमार कौशिक, बायोमेडिकल इंजीनियर छिरौद रौतिया, तत्कालीन उपप्रबंधक कमलकांत पाटनवार, डिप्टी डायरेक्टर डॉ.अनिल परसाई, और तत्कालीन बायोमेडिकल इंजीनियर दीपक कुमार बंधे शामिल हैं। ईओडब्ल्यू-एसीबी के अफसरों ने लंबी पूछताछ के बाद इन सभी को गिरफ्तार किया है।

इन सभी के खिलाफ मोक्षित कार्पोरेशन, सीबी कार्पोरेशन, रिकॉर्ड्स एंड मेडिकेयर सिस्टम, एच.एस.आई.बी.सी. और शारदा इंडस्ट्रीज के साथ आपराधिक षडय़ंत्र कर पूल-टेंडरिंग कर स्वास्थ्य विभाग में होने वाले री-एजेंट, और मशीन की बाजार दर से अधिक कीमत पर विक्रय कर आर्थिक क्षति पहुंचाने के साक्ष्य मिले हैं। इन सभी के खिलाफ धारा 409, 120बी, भादवि और धारा 13ए (1), सहपठित धारा 13 (2), 7 सी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-1988 के तहत अपराध पंजीबद्ध किया गया है।

ईओडब्ल्यू-एसीबी ने सबसे पहले मोक्षित कार्पोरेशन के रायपुर, दुर्ग, और जगदलपुर स्थित दफ्तरों में भी छापेमारी की थी। कंपनी के डायरेक्टर शशांक चोपड़ा से पूछताछ के बाद अफसरों की मिलीभगत सामने आई है। विधानसभा में स्वास्थ्य मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल ने माना कि करोड़ों के भ्रष्टाचार में विभागीय अधिकारियों की संलिप्तता रही है। ईओडब्ल्यू-एसीबी ने 15 अधिकारियों की संलिप्तता उजागर की है।

जायसवाल ने विधानसभा में बताया था कि सभी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए जांच एजेंसी को सहमति दे दी गई है। इसके बाद कार्रवाई की अटकलें लगाई जा रही थी। विधानसभा में यह भी बताया गया कि अधिकारी और सप्लायरों के गठजोड़ के चलते 8 से 10 गुना अधिक कीमत पर री-एजेंट और उपकरण खरीदे गए। गैरजरूरी उपकरणों की खरीदी हुई है। करीब 7 सौ उपकरण अभी डम्प पड़े हैं। पांच अधिकारियों की गिरफ्तारी के बाद कुछ और लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।

दो आईएएस अफसरों पर भी गिरेगी गाज?
ईओडब्ल्यू-एसीबी की टीम तत्कालीन स्वास्थ्य संचालक भीम सिंह और सीजीएमएससी चन्द्रकांत वर्मा से पूछताछ कर चुकी है। चन्द्रकांत वर्मा खैरागढ़ कलेक्टर हैं। दोनों अफसरों की भी संलिप्तता पाई गई है। कहा जा रहा है कि दोनों के खिलाफ जल्द एक्शन हो सकता है।

दो साल के ऑडिट में खुली थी पोल
इस पूरे मामले को लेकर 660 करोड़ रुपए के गोल-माल को लेकर भारतीय लेखा एंव लेखापरीक्षा विभाग के प्रिंसिपल अकाउंटेंट जनरल (ऑडिट) आईएएस यशवंत कुमार ने एडिशनल चीफ सेक्रेटरी मनोज कुमार पिंगआ को पत्र लिखा था। लेखा परीक्षा की टीम की ओर से सीजीएमएससी की सप्लाई दवा और उपकरण को लेकर वित्त वर्ष 2022-24 और 2023-24 के दस्तावेज को खंगाला गया तो कंपनी ने बिना बजट आवंटन के 660 करोड़ रुपये की खरीदी की थी, जिसे ऑडिट टीम ने पकड़ लिया था। ऑडिट में पाया गया है कि पिछले दो सालों में आवश्यकता से ज्यादा खरीदे केमिकल और उपकरण को खपाने के चक्कर में नियम कानून को भी दरकिनार किया गया। 

बिना जरूरत की हॉस्पिटलों को सप्लाई
खरीदे गए दवाई व उपकरण को प्रदेश के 776 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों सप्लाई की गई, जिनमें से 350 से अधिक ही प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र ऐसे हैं, जिसमें कोई तकनीकी, जनशक्ति और भंडारण सुविधा उपलब्ध ही नहीं थी। ऑडिट टीम के अनुसार डीएचएस ने स्वास्थ्य देखभाल की सुविधाओं में बेसलाइन सर्वेक्षण और अंतर विश्लेषण किए बिना ही उपकरणों और रीएजेंट मांग पत्र जारी किया था। 

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