0 भारत सरकार चला रही रणभूमि दर्शन योजना
0 सीमा पर लोंगों की भीड़ देशभक्ति की भावना जगा रही
नाथुला बॉर्डर से शंकर चंद्राकर
गंगटोक। भारत-चीन बॉर्डर नाथुला दर्रे की भारतीय सीमा पर आजकल आम लोंगों के जज्बे और साहस का समंदर देखने को मिल रहा है। वहीं दूसरी तरफ चीन की सीमा पर सन्नाटा पसरा हुआ है। चीन बॉर्डर पर तैनात कुछेक चीनी सैनिक ही नजर आते हैं, जो आश्चर्य भरी नजरों से भारतीयों की भीड़ को निहारते रहते हैं। भारतीय सीमा पर लोगों की यह भीड़ केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही रणभूमि दर्शन योजना से देखने को मिल रही है। 14 हजार 140 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित नाथुला पर जवानों के हौसले को देखकर लोगों के अंदर भी देशभक्ति की भावना जाग रही है। इससे देश में बॉर्डर टूरिज्म को बढ़ावा मिल रहा है। सिक्किम के सामरिक महत्व वाले बॉर्डर को पर्यटन के लिए खोलने से राज्य में पर्यटन क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल रही है।
दूसरे राज्यों के लोग भी बड़ी संख्या में नाथुला पहुंचने लगे हैं और नजदीक से भारतीय सेना और जवानों के हौसले को सलाम कर रहे हैं। चीन बॉर्डर से लगे इस पूर्वोत्तर राज्य में नाथुला को पहले से ही पर्यटकों के लिए खोल दिया गया था, जबकि हाल ही में छोला और डोकला दर्रों को भी पर्यटकों के लिए खोल दिया गया गया है। ये ऐतिहासिक और सैन्य दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है, जहां भारतीय सैनिकों ने 1967 में बहादुरी दिखाई थी। इस योजना के तहत दिसम्बर 2025 में सिक्किम सरकार ने छोले और डोकला दर्रे को पर्यटकों के लिए खोल दिया है, जिससे राज्य में बॉर्डर टूरिज्म, स्थानीय रोजगार और सीमावर्ती क्षेत्र के विकास को बढ़ावा मिला है।
भारतीय सेना और पर्यटन मंत्रालय के सहयोग से चलाई जा रही इस पहल से पर्यटक अब इन ऊंचाई वाले दर्रों का दौरा कर सकते हैं। इस दौरान सेना और सरकार द्वारा सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा है, ताकि सीमा की सुरक्षा में भी किसी तरह की चूक न हो। इससे एक तरफ जहां सिक्किम के दूरस्थ इलाकों में पर्यटन से जुड़े रोजगार के अवसर बढे हैं, वहीं दूसरी तरफ आम लोगों में देश की सैन्य विरासत से जुड़ाव मजबूत हुआ है।
नाथुला में हम चीन के ऊपर
नाथुला में तैनात सूबेदार अजय सिंह ने बताया कि नाथुला में भारतीय चौकी चीन से ऊपर है, इसलिए चीन कुछ हिमाकत नहीं कर पाता है। यही वजह है कि चीनी सैनिक हम पर कभी हावी होने का दुस्साहस नहीं करते।
चीनी बॉर्डर पर सन्नाटा
एक तरफ जहां भारतीय सीमा पर लोगों की भीड़ लगी रहती है, वही चीन बॉर्डर पर सन्नाटा पसरा रहता है। चीनी सैनिक भावहीन होकर भारतीयों की भीड़ को टकटकी लगाए देखते रहतें हैं।
बाबा हरभजन सिंह का मंदिर
नाथुला बॉर्डर के नीचे कुछ ही दूरी पर बाबा हरभजन सिंह का मंदिर है। कहा जाता है कि आज भी बाबा सैनिकों को सपने में आकर दुश्मनों की योजनाओं को बताकर देश की सेवा करते हैं। पहले उन्हें सेना में रैक दिया गया था। अब उन्हें रिटायर घोषित किया गया है। बाबा ने सैनिक के रूप में 30 जून 1965 से 4 अक्टूबर 1968 तक सेवा की थी। बाबा की मृत्यु 1968 में नाथूला (दर्रे) के पास हुई थी। उनके समाधि स्थल के पास लगे एक बोर्ड पर लिखा है कि टुकु ला से डोंगचुई ला तक खच्चरों के काफिले को ले जाते समय नाले में गिरने से उनकी मृत्यु हुई थी। बाबा की 22 वर्ष की आयु में हुई असामयिक मृत्यु किंवदंती और धार्मिक श्रद्धा का विषय बन गई है, जो भारतीय सेना के नियमित जवानों , उनके गाँव के लोगों के बीच लोकप्रिय हो गई है। भारतीय सैनिकों के बीच वह "संत बाबा" के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि हर साल 11 सितंबर को, उनकी निजी वस्तुओं से भरी एक जीप निकटतम रेलवे स्टेशन, न्यू जलपाईगुड़ी के लिए रवाना होती है, जहाँ से इसे ट्रेन द्वारा पंजाब राज्य के कपूरथला जिले के कुका गाँव भेजा जाता है । भारतीय रेलवे की किसी भी ट्रेन में खाली बर्थ हमेशा प्रतीक्षा सूची में शामिल यात्रियों को या कोच परिचारकों द्वारा पहले आओ पहले पाओ के आधार पर आवंटित की जाती हैं, लेकिन बाबा के लिए एक विशेष आरक्षण किया जाता है। हर साल उनके गृहनगर की यात्रा के लिए एक सीट खाली छोड़ी जाती है और तीन सैनिक बाबा के साथ उनके घर तक जाते हैं। उनका गाँव आज भी उन्हें शहीद के रूप में याद करता है।