0 जन-धन,आधार और मोबाइल की तिगड़ी ने बदली तस्वीर
नई दिल्ली/मुंबई। भारत में लोगों की बचत का तरीका तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक बचत के बजाय अब लोग औपचारिक और बाजार से जुड़े वित्तीय उत्पादों (मार्केट लिंक्ड फाइनेंशियल प्रोडक्ट) की ओर बढ़ रहे हैं। हालांकि, यह बदलाव अभी शुरुआती चरण में है। बढ़ती आय, संपत्ति बनाने के नए अवसर, अर्थव्यवस्था का बढ़ता औपचारिकीकरण और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार इस बदलाव को रफ्तार दे रहे हैं। यह जानकारी फ्रैंकलिन टेम्पलटन इंडिया म्युचुअल फंड की रिपोर्ट ‘फाइनेंशियलाइजेशन ऑफ सेविंग्स इन इंडिया-फ्रॉम सेफ्टी टू स्केल’ में सामने आई है।
घरों की बचत अब बाजार तक पहुंच रही
रिपोर्ट में परिवारों की बचत में हो रहे एक बड़े बुनियादी बदलाव को रेखांकित किया गया है। निवेशक अब ज्यादा रिटर्न की संभावना वाले विकल्पों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। हालांकि इसके साथ बाजार से जुड़े जोखिम भी बढ़ रहे हैं। मार्च 2020 से मार्च 2025 के बीच मैनेज्ड इन्वेस्टमेंट्स में करीब 17.5 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी हुई। इसके मुकाबले बैंक जमा में करीब 11.7 फीसदी की दर से वृद्धि हुई। इसके चलते दोनों कैटेगरी के बीच का अंतर करीब 32 लाख करोड़ रुपये से घटकर लगभग 7 लाख करोड़ रुपये रह गया। रिपोर्ट के मुताबिक, बचत में यह बदलाव भारत की जनसांख्यिकीय स्थिति से भी जुड़ा है। देश की करीब 65 फीसदी आबादी 35 साल से कम उम्र की है, जबकि आबादी की औसत आयु करीब 28 साल है। रिपोर्ट का अनुमान है कि बढ़ती आय और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के चलते फाइनैंशियल प्रोडक्ट्स में निवेश की शुरुआती बाधाएं कम होती रहेंगी। ऐसे में अगले दशक में कुल वित्तीय बचत तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ सकती है।
डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से बदल रही बचत की तस्वीर
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वित्तीयकरण की यात्रा इसलिए भी अलग है क्योंकि यह बड़े पैमाने पर डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के आधार पर आगे बढ़ रही है। जन धन-आधार-मोबाइल (जेएएम) की तिगड़ी, आधार आधारित ई-केवाईसी, यूपीआई और अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क ने फाइनैंशियल प्रोडक्ट्स को खोजने, उनमें निवेश करने और उनकी सेवाओं का इस्तेमाल करने से जुड़ी लागत और परेशानियों को कम किया है। इसकी वजह से ऐसे फाइनैंशियल प्रोडक्ट, जिनके लिए पहले बैंक शाखाओं में जाना, कागजी कार्रवाई और किसी की मदद से अकाउंट खोलना जरूरी होता था, अब तेजी से डिजिटल माध्यम से उपलब्ध और संचालित हो रहे हैं। इससे बड़े शहरों से बाहर भी औपचारिक निवेश की पहुंच बढ़ाने में मदद मिली है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसलिए वित्तीयकरण को सिर्फ कैपिटल मार्केट की कहानी नहीं माना जा सकता। यह अर्थव्यवस्था के बढ़ते औपचारिकीकरण की प्रक्रिया भी है। जैसे-जैसे ज्यादा परिवार डिजिटल पहचान, डिजिटल पेमेंट और सहमति आधारित फाइनैंशियल सिस्टम से जुड़ रहे हैं, उनकी वित्तीय गतिविधियों का रिकॉर्ड यानी फाइनेंशियल फुटप्रिंट भी बढ़ रहा है। इससे भविष्य में कर्ज, निवेश उत्पादों और वित्तीय सलाह तक उनकी पहुंच बेहतर होने की संभावना है।
म्युचुअल फंड निवेश में भारत अभी शुरुआती दौर में
म्युचुअल फंड इंडस्ट्री का एसेट अंडर मैनेजमेंट (एयूएम) सालाना करीब 19 फीसदी की दर से बढ़ा है। जुलाई 2021 में यह 35.32 लाख करोड़ रुपये था, जो जुलाई 2026 में बढ़कर 85.76 लाख करोड़ रुपये हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक, इस ग्रोथ को खुदरा निवेशकों की बढ़ती भागीदारी, सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के बढ़ते इस्तेमाल और युवा निवेशकों के बाजार से जुड़े बचत विकल्पों की ओर बढ़ते रुझान से समर्थन मिला है। हालांकि, म्युचुअल फंड एयूएम में तेज बढ़ोतरी के बावजूद भारत का एयूएम से जीडीपी अनुपात (एयूएम-टू-जीडीपी रेशियो) अभी भी विकसित बाजारों के मुकाबले कम है। इससे संकेत मिलता है कि म्युचुअल फंड उद्योग में आगे भी विकास की काफी गुंजाइश है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में म्युचुअल फंड और इक्विटी फिलहाल परिवारों की कुल निवेश योग्य संपत्ति का केवल 15-20 फीसदी हिस्सा हैं। इसके मुकाबले अमेरिका और कनाडा जैसे विकसित बाजारों में यह हिस्सेदारी करीब 50-60 फीसदी है।
