नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को हिरासत के बाद कोर्ट में पेश करने की 24 घंटे की समय सीमा को साफ किया। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समयसीमा उसे हिरासत में लेते ही शुरू हो जाएगी। यह समय औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के समय से नहीं गिना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति को पहले हिरासत में लेकर बाद में उसकी गिरफ्तारी दर्ज करने का रास्ता नहीं अपना सकतीं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला गिरफ्तार त्रिपुरा के चार लोगों की याचिका से जुड़ा है। इनका आरोप है कि हिरासत में लेने और गिरफ्तारी दर्ज करने के बीच करीब 21 घंटे का अंतर था। मामले की सुनवाई जस्टिस उज्जवल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुर की बेंच में हुई।
अब तक पुलिस संदिग्ध को हिरासत में रखकर जब तक चाहे पूछताछ करती है।एफआईआर दर्ज होने पर उसमें जो समय लिखा होता है उसके आधार पर ही 24 घंटे के अंदर कोर्ट में पेश करती है, लेकिन अब हिरासत के समय से 24 घंटे के अंदर कोर्ट में पेश करना होगा।
हिरासत और गिरफ्तारी में अंतर
जब व्यक्ति अपनी मर्जी से कहीं नहीं जा सकता और पुलिस या अदालत के नियंत्रण में होता है, तो वह हिरासत में माना जाता है। हर गिरफ्तारी में हिरासत होती है, लेकिन हर हिरासत गिरफ्तारी नहीं होती। लाइव लॉ के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पुलिस गिरफ्तारी मेमो और केस डायरी में अपना दर्ज समय बताएगी। लेकिन मजिस्ट्रेट को उसकी जांच करनी होगी। जरूरत पड़ने पर सीसीटीवी और दूसरे सबूत भी देखे जा सकते हैं।
त्रिपुरा हाईकोर्ट ने आरोपियों की याचिका खारिज की थी
मामला त्रिपुरा में 11.03 किलो याबा टैबलेट की जब्ती से जुड़ा था। 29 सितंबर 2025 को दोपहर 2 बजे तलाशी और जब्ती की कार्रवाई के दौरान चारों लोगों को हिरासत में लिया गया, लेकिन पुलिस ने उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन यानी 30 सितंबर को सुबह 11 बजे दर्ज की। मतलब हिरासत में लेने और गिरफ्तारी दर्ज करने के बीच करीब 21 घंटे का अंतर था। आरोपियों का कहना था कि उन्हें हिरासत में लेने के 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए था। मामला त्रिपुरा हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। इसके बाद आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई।