0 गरीबी ने नक्सलवाद नहीं, नक्सलवाद ने गरीबी फैलाई
नई दिल्ली। नक्सलवाद पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को लोकसभा में कहा कि भारत नक्सल-मुक्त हो गया है, ऐसा हम कह सकते हैं। अपनी डेढ़ घंटे स्पीच के दौरान शाह ने कहा कि हमने 31 मार्च तक देश को नक्सल-मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा था। मैं पूरी व्यवस्था होने के बाद देश को भी सूचित करूंगा।
श्री शाह ने कहा कि जो लोग पूरी व्यवस्था को नकार कर हथियार उठा लेते हैं, उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। सालों से भोले-भाले आदिवासियों को अंधेरे में रखा गया। वामपंथियों ने अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए आदिवासियों को बहकाया।
श्री शाह ने कहा कि कांग्रेस ने 60 साल के दौरान आदिवासियों तक घर, स्कूल, मोबाइल टॉवर नहीं पहुंचने दिया और अब हिसाब मांग रहे हैं। अपने गिरेबान में झांककर देखिए। आदिवासी इलाकों में गरीबी के कारण नक्सलवाद नहीं फैला, बल्कि नक्सलवाद के कारण सालों तक गरीबी रही। नक्सलवाद की जड़ें वैचारिक हैं। यह गरीबी और विकास से जुड़ी नहीं हैं।
बता दें कि संसद में आज नक्सलवाद पर चर्चा सरकार की तरफ से दी गई डेडलाइन खत्म होने से एक दिन पहले हुई। शाह कई बार 31 मार्च, 2026 तक देश से नक्सलवाद पूरी तरह से खत्म करने की घोषणा कर चुके हैं।
बस्तर से नक्सलवाद पूरी तरह खत्म
केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने कहा कि बस्तर से नक्सलवाद लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है। हर एक गांव में स्कूल खोलने के लिए अभियान चलाया गया। हर गांव में राशन की दुकान, हर तहसील और पंचायत में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) स्थापित किए गए हैं। लोगों को आधार कार्ड और राशन कार्ड जारी किए गए हैं। उन्हें पांच किलोग्राम अनाज मिल रहा है।
नक्सलवाद की वकालत करने वालों से सवाल
केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने कहा कि जो नक्सलवाद की वकालत कर रहे थे, उनसे पूछना चाहता हूं कि आदिवासियों के पास अब तक विकास क्यों नहीं पहुंचा। बस्तर के लोग इसलिए पीछे रह गए, क्योंकि इस क्षेत्र पर 'लाल आतंक' का साया मंडरा रहा था। आज वह साया हट गया है और बस्तर अब विकास के पथ पर अग्रसर है।
कांग्रेस ने नक्सलियों का समर्थन किया
केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने कहा कि 70 में से 60 साल कांग्रेस की सरकार रही। आपने क्यों नहीं किया विकास। आज आप हिसाब मांग रहे हो। इंदिरा गांधी माओवादी विचारधारा की गिरफ्त में थीं। उनके कार्यकाल में नक्सलवाड़ी से शुरू हुआ आंदोलन 12 राज्यों, 17 प्रतिशत भू-भाग 10 प्रतिशत से ज्यादा आबादी में फैल गया। राहुल गांधी ने नक्सल समर्थकों के साथ मंच साझा किया था और ‘प्रो-हिडमा’ नारे का समर्थन किया था।
मनमोहन ने कहा था- माओवादी देश की सबसे बड़ी समस्या
केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वीकारा था कि जम्मू-कश्मीर और नॉर्थ ईस्ट की तुलना में देश की आंतरिक सुरक्षा में सबसे बड़ी समस्या माओवादी है। 2014 में बदलाव हुआ। धारा 370 हटी, 35-ए हटा, राम मंदिर बना, सीएए कानून आ गया है, विधायी मंडलों में महिलाओं को 33% आरक्षण मिल गया है।
कुछ लोगों की मानवता सिर्फ हथियार उठाने वालों के लिए
केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने कहा कि मैं उन ‘अर्बन नक्सलियों’ से एक सवाल पूछना चाहता हूं, जो इन लोगों के समर्थन में सामने आए हैं। वे कहते हैं कि नक्सली न्याय के लिए लड़ रहे हैं, इसलिए उन्हें मारा नहीं जाना चाहिए। उनसे सहानुभूति रखनी चाहिए। ऐसा लगता है कि आपकी मानवता सिर्फ संविधान का उल्लंघन करने वालों और हथियार उठाने वालों के लिए हैं। यह उन आम नागरिकों तक नहीं पहुंचती, जो इन्हीं हथियारों से मारे जा रहे हैं।
तीन सालों में 706 नक्सली मारे गए
केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने कहा कि जनवरी 2024 में छत्तीसगढ़ में सरकार बदली। 24 अगस्त 2024 को मैंने कहा था कि 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद देश से समाप्त हो जाएगा। 11 साल में 596 पुलिस स्टेशन बने, नक्सल प्रभावित जिले 2014 में 126 थे आज सिर्फ 2 है। ज्यादा प्रभावित जिले 35 थे आज शून्य हैं। नक्सल घटनाएं दर्ज करने वाले पुलिस स्टेशन 350 से 7 हो गए। पिछले तीन साल 2024-25 और 2026 में देश में 706 नक्सली मारे गए, 2218 गिरफ्तार और 4839 ने सरेंडर किया।
शाह बोले- भूपेश बघेल को पूछो प्रूफ दूं क्या
शाह ने कहा कि 20 अगस्त 2019, 24 अगस्त 2024 और 31 मार्च 2026, तीन तारीख बताना चाहता हूं। 20 अगस्त 2019 को गृह मंत्रालय में एक मीटिंग हुई। पूर्व नक्सलियों को खुफिया इनपुट में लेने का काम, ये सब उसी मीटिंग में डिजाइन किए गए। देर क्यों लगी, क्योंकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार थी। छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने नक्सलवादियों को बचाकर रखा। इस पर विपक्ष ने हंगामा किया। शाह ने कहा कि मुझे किसी व्यक्ति के सामने नहीं करना है। भूपेश बघेल को पूछो प्रूफ दूं क्या यहां पर। हां बोलें तो बोलो, वरना फंस जाओगे। 2023 में छत्तीसगढ़ में सरकार बदली और दूसरे ही महीने वहां गया था।
नक्सली हिंसा करने वालों के दिन लद गए हैं
अमित शाह ने कहा- नक्सलियों के पास से जो हथियार पकड़े गए वो पुलिस से लूटे गए थे। उन हथियारों से महिलाओं, बच्चों, निर्दोष जवानों और किसानों को मारा गया। वामपंथी विचारधारा ने इसको प्रोपेगैंडा के माध्यम से एक भ्रम की तरह फैलाया। उन्होंने अपनी विचारधारा को फैलाने के लिए कहा कि अन्याय से बचने के लिए हथियार हाथ में उठाए। शाह ने कहा- मैं फिर से पूछना चाहता हूं कि राज्य शासन और संविधान की वैधता को किसी भी अन्याय के एवज में चुनौती दी जा सकती है क्या। अन्याय के खिलाफ लड़ने का हमारे संविधान ने रास्ता बनाया। राजकुमार राउत यहां बैठे नहीं तो वो भी सरेंडर की लिस्ट में होते अगर हाथ में हथियार लिया होता। शाह ने कहा- वामपंथियों ने वैक्यूम खड़ा करने का प्रयास किया। संविधान का, सारी व्यवस्था नष्ट करके शासन का, स्टेट का, पुलिस थानों को जलाकर सुरक्षा का वैक्यूम खड़ा किया है। लेकिन अब माओवादी हिंसा करने वालों का, नक्सली हिंसा करने वालों के दिन लद गए हैं।
ये डरने वाली सरकार नहीं, न्याय करने वाली सरकार है
गृह मंत्री ने कहा कि अगर विकास, प्रति व्यक्ति आय पैमाना होता तो देश के बहुत सारे हिस्से थे जहां 70 के दशक में विकास नहीं पहुंचा था। वहां नक्सलवाद क्यों नहीं पहुंचा। कांग्रेस के इस विचार को सदन से खारिज करता हूं कि अन्याय किसी के साथ भी हो सकता है। विकास कम ज्यादा हो सकता है। हम संवैधानिक तरीके से लड़ाई लड़ेंगे या हाथ में हथियार लेकर निर्दोषों को मार डालेंगे। किस थ्योरी का यहां से समर्थन कर रहे हैं। शाह ने कहा- किसी के भी साथ अन्याय हो तो हथियार हाथ में उठा लेना लोकतांत्रिक तरीका नहीं है। अगर आप धमकाना चाहते हैं तो ये डरने वाली सरकार नहीं है। सबके साथ न्याय करने वाली सरकार है। संविधान ने हर चीज की व्यवस्था की है।
शाह ने आगे कहा- मैं इस देश को युवाओं को नक्सलवाद की टाइमलाइन बताना चाहता हूं। 1970 के दशक में नक्सलवाद की शुरुआत नक्सलवाड़ी, बंगाल से हुई। वहां 1971 में एक साल के दौरान 3620 हिंसा की घटनाएं वहां हुईं। 80 का दशक आते-आते पीपल्स वॉर ग्रुप बन गया और महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा में फैले।
अमित शाह ने कहा कि 1990 के दशक में दुनियाभर में जैसे वामपंथी विचारधारा सिमटती गई। यहां भी उग्रवादी गुटों और वामपंथियों पार्टियों में विलय हुआ और 2004 में 2 प्रमुख गुट मिल गए और सीपीआई माओवादी का गठन किया। 70 से 2004 तक चार साल छोड़कर पूरे साल कांग्रेस का शासन था। कब माओवादी विचारधारा फैली पनपी आपको याद रखना चाहिए।
आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद के कारण गरीबी रही
गृह मंत्री ने कहा कि आदिवासी इलाकों में गरीबी के कारण नक्सलवाद नहीं फैला बल्कि नक्सलवाद के कारण सालों तक गरीबी रही। नक्सलवाद की जड़ें गरीबी और विकास से जुड़ी नहीं हैं। ये वैचारिक हैं। नरेंद्र मोदी के शासन में आदिवासी इलाकों में विकास घर-घर पहुंच रहा है। मैं चार क्षेत्र के बारे में बताना चाहता हूं। नक्सलवाड़ी में साक्षरता का दर 35%, बस्तर में 23%, सहरसा 33%, और बलिया में 31% है। चारों स्थानों पर साक्षरता का दर कमोबेश समान था। शाह ने कहा कि प्रति व्यक्ति आय नक्सलवाड़ी में 500 रुपए, बस्तर में 190 रुपए, सहरसा में 299 रुपए और बलिया में 374 रुपए थी। आय भी समान थी लेकिन नक्सलवाड़ी और बस्तर में वामपंथी उग्रवाद पनपा लेकिन सहरसा और बलिया में नहीं। सहरसा और बलिया की भूगोल उनके अनुकूल नहीं थी। वहां जंगल नहीं थे। छिपने के लिए नदी-नाले और पहाड़ी नहीं थीं। हथियार लेकर मूवमेंट करने का, आदिवासियों को दबाने का, उनको जबरदस्ती अपनी विचारधारा से जोड़ने की अनुकूलता नहीं थी।