मुंबई। महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने बुधवार को सत्ता छोड़ने से पहले अपनी सियासी जमीन मजबूत करने के इरादे से बड़े व दूरगामी फैसले लिए। इसे लेकर शिवसेना ने अपने मुख पत्र में विस्तार से कई बातें लिखीं। 'सामना' के संपादकीय में भाजपा और बागियों पर तंज भी किया गया। पार्टी ने लिखा कि 'औरंगाबाद' को संभाजीनगर करने को लेकर कई लोगों के पेट में दर्द हुआ, लेकिन उसकी परवाह नहीं है।'
आखिरकार 29 जून को पार्टी में बगावत के चलते उद्धव ठाकरे नीत शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस की महाविकास अघाड़ी की 31 माह पुरानी सरकार का पतन हो गया। इससे पहले राज्यपाल बीएस कोश्यिारी ने सीएम उद्धव ठाकरे को विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने का निर्देश दिया। इसे ठाकरे सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने तीन घंटे से ज्यादा चली बहस के बाद राज्यपाल के निर्देश को कायम रखा। इसके तुरंत बाद ठाकरे ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि इसके पूर्व बुधवार को दिन में महाराष्ट्र सरकार ने कई अहम फैसले किए।
जनभावना पर आधारित हैं निर्णय
शिवसेना ने पूर्ववर्ती ठाकरे सरकार के इन फैसलों को लेकर 'सामना' में लिखा है कि ये जनभावना पर आधारित निर्णय हैं। नई मुंबई हवाई अड्डे को लोकनेता दी.बा. पाटील का नाम देने का निर्णय लिया गया है और औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर और उस्मानाबाद का धाराशीव कर के उद्धव ठाकरे ने वचन पूरा किया। 'औरंगाबाद' को संभाजीनगर करने को लेकर कई लोगों के पेट में दर्द हुआ फिर भी उसकी परवाह किए बगैर यह निर्णय लिया गया।
अयोध्या से बाबर का तो महाराष्ट्र से औरंगाबाद का नाम मिटाया
शिवसेना ने लिखा 'अयोध्या के बाबर का नामोनिशान शिवसैनिकों ने हमेशा के लिए नष्ट कर दिया उसी तरह औरंगाबाद का नाम महाराष्ट्र से मिटा दिया। इस पर महाराष्ट्र के मुसलमान भाइयों को भी अभिमान होना चाहिए। जिस तरह से बाबर हमारा कुछ नहीं लगता था उसी तरह औरंगजेब से भी हमारा रिश्ता-नाता या खून का कोई संबंध नहीं था। वह छत्रपति संभाजी राजा का हत्यारा था और शिवराय उसके मुगल शासन के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़े थे।'
महाराष्ट्र शिवराय व बाला साहेब के विचारों का अनुयायी
'सामना' में पार्टी ने लिखा कि 'महाराष्ट्र के किसी जिले का नाम औरंगजेब के नाम पर होना यह क्लेशदायक था ही, साथ ही स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने वाला था। हाल के दिनों में कुछ लोगों के औरंगजेब की कब्र पर जानबूझकर नमाज आदि अता करने के लिए आने से यह अवशेष कुछ ज्यादा ही चर्चा में आ गया। परंतु महाराष्ट्र सिर्फ शिवराय के विचारों का और हिंदू हृदय सम्राट शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे की भूमिका को मानने वाला है।
'अयोध्या' प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय जिस नम्रता से देश भर के मुस्लिम समाज ने स्वीकार किया था, वही भूमिका संभाजीनगर के मामले में अपनानी चाहिए।
पिछली फडणवीस सरकार ने यह पुण्य कर्म क्यों नहीं किया?
सामना में सवाल उठाया गया है कि हाल ही में विपक्ष ने सवाल उठाया था कि ठाकरे सरकार औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर करने से डरती है? लेकिन फडणवीस की पूर्ववर्ती सरकार ने यह पुण्य कर्म क्यों नहीं किया, इस सवाल का उत्तर उन्हें पहले देना चाहिए! कई बार लोकभावना का ही आदर करके निर्णय लेना पड़ता है।
मराठवाड़ा के मुक्ति संग्राम के लिए शहादत देने वालों की मानवंदना
सामना में कहा गया है कि उस्मानाबाद का धाराशीव के रूप में नामांतरण भी लंबे समय से लंबित पड़ा था। इस मामले में भी शिवसेना ने वचन दिया था। मराठवाड़ा औरंगजेब की तरह निजाम के पैरों तले रौंदा गया हिस्सा है। एक बड़े संघर्ष के बाद मराठवाड़ा का निर्माण हुआ।
औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर और उस्मानाबाद का नाम धाराशीव करना मराठवाड़ा के मुक्ति संग्राम के लिए जिन्होंने शहादत दी, त्याग किया उन सभी वीरों के लिए मानवंदना सिद्ध होगा। यह निर्णय दोनों पक्षों को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करना चाहिए। तभी हिंदुत्व का सम्मान रहेगा और राष्ट्रभक्ति की भावना मजबूत होगी।
दी.बा. पाटिल ने मेहनतकशों के लिए जिंदगी न्योछावर की
शिवसेना ने अपने मुख पत्र में कहा है कि ठाकरे सरकार ने नवी मुंबई स्थित अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को स्व. दी.बा. पाटील का नाम देने के प्रस्ताव को भी मंजूर किया। मेहनतकशों के लिए जिंदगी न्योछावर करने वाले, उनके लिए लड़ने वाले लोकनेता दी.बा. पाटील का नाम हवाई अड्डे को दिया जाए, इसके लिए नई मुंबई व आसपास के जिलों के लोगों की एक कृति समिति तैयार की गई।
उसके जरिए उन्होंने मुहिम चलाई। इस हवाई अड्डे को हिंदू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे का नाम दिया जाए या दी.बा. पाटील का, ऐसा विवाद खड़ा किया गया। आगरी, कोली व अन्य तमाम भूमिपुत्रों के मन में शिवसेनाप्रमुख के प्रति अपार श्रद्धा है ही, फिर भी स्थानीय लोगों के नेता 'दी.बा.' का नाम देने का आग्रह उद्धव ठाकरे ने स्वीकार किया।
दी.बा. सिर्फ रायगढ़, ठाणे जिला अथवा नई मुंबई के एक विशिष्ट समाज के नेता नहीं थे। आज की नई मुंबई को आबाद करने और उस काम के लिए अपनी जमीन, जायदाद और खेत गवां दिए। लोगों को इंसाफ मिले इसके लिए वे लड़ते रहे।
विरोधियों के पास बोलने को क्या बचा?
सामना में शिवसेना ने कहा कि हमने लोक भावना का आदर सदैव किया है। संभाजीनगर, धाराशीव व 'दी.बा.' के निर्णय से महाराष्ट्र की अस्मिता को तेज प्राप्त हुआ है और ठाकरे सरकार निखरकर सामने आई है। विरोधियों के पास अब बोलने के लिए क्या बचा है?