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नई दिल्ली। राज्यों के विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में दल बदल निरोधक कानून को लेकर चर्चा हुई लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया। इस पर विचार के लिए बनी समिति का कहना है कि इस बारे में आम जनता, राजनीतिक दलों एवं न्यायपालिका से भी विचार विनिमय करना आवश्यक है।

कनाडा के हैलीफैक्स में 20 से 26 अगस्त के बीच होने वाले राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (सीपीयू) के 65वें अधिवेशन की तैयारियों को लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन में महाराष्ट्र और गोवा की घटनाओं के संदर्भ में दल बदल निरोधक कानून के बारे में भी चर्चा हुई।

बैठक के उद्घाटन सत्र के बाद मीडिया से बातचीत में श्री बिरला ने कहा कि दल बदल निरोधक कानून को लेकर आज की बैठक में चर्चा हुई लेकिन कोई निर्णय नहीं हुआ है। इस कानून को लेकर समिति की राय है कि अन्य पक्षों के साथ भी विचार विनिमय करना आवश्यक है।
सूत्रों के अनुसार दल बदल निरोधक कानून पर विचार के लिए समिति के अध्यक्ष राजस्थान के विधानसभा अध्यक्ष सी पी जोशी ने इस विषय में आम जनता, राजनीतिक दलों एवं न्यायपालिका से भी विचार विनिमय करने पर बल दिया क्योंकि वे इससे प्रभावित होते हैं।
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि इसके साथ ही पीठासीन अधिकारियों में सहमति बनी कि राष्ट्रपति एवं राज्यपालों के अभिभाषण में व्यवधान नहीं हो। यह मर्यादा अनुकूल नहीं है। सभी पीठासीन अधिकारी अपने अपने राज्यों के राजनीतिक दलों से इस बारे में चर्चा करेंगे। इसके अलावा विधानसभा में सत्रों के घटते दिनों और जनता की भागीदारी को बढ़ाने के बारे में भी बात हुई।
श्री बिरला ने कहा कि सीपीयू के अधिवेशन में 54 देशों के 181 प्रतिनिधि शामिल हाेंगे जिनमें से भारत के 27 विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि 23 अगस्त को औपचारिक सम्मेलन होगा। आठ विषयों पर अलग अलग समूह बनाये गये हैं जिनमें विधानसभा अध्यक्षों एवं विधान परिषद के सभापतियों को रखा गया है। उन्होंने बताया कि सीपीयू के अधिवेशन में मुख्यत: पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में संसद की भूमिका, लोकतंत्र एवं संसद में महिलाओं एवं युवाओं की ज्यादा भागीदारी, संसद में नवान्वेष के माध्यम से जनता तक सीधी पहुंच बनाना, सशक्त प्रौद्योगिकी के माध्यम से उच्च मानकों का अनुपालन, महामारी के दौरान संसद एवं विधानसभाओं की भूमिका पर चर्चा हाेगी।