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0 शीर्ष अदालत ने कहा- पिता की मौत के बाद मां को बच्चों का सरनेम बदलने का हक

नई दिल्ली। पति की मौत के बाद एक मां अगर दूसरी शादी करती है तो वो अपने बच्चों को सरनेम तय करने की हकदार है। यानी मां दूसरे पति का सरनेम अपने बच्चों को दे सकती है। शुक्रवार को आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट का एक फैसला पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है।

क्या है पूरा मामला 
सुप्रीम कोर्ट में यह केस आंध्र प्रदेश की अकेला ललिता ने दायर की थी। ललिता ने 2003 में कोंडा बालाजी से शादी की थी। मार्च 2006 में उनके बेटे के जन्म के तीन महीने बाद ही कोंडा की मौत हो गई। पति की मौत के एक साल बाद ललिता ने वायुसेना में विंग कमांडर अकेला रवि नरसिम्हा सरमा से शादी की।

इस शादी से पहले ही दंपती का एक बच्चा और था। ये सभी एक साथ रहते हैं। जब विवाद शुरू हुआ उस समय बच्चा अहलाद अचिंत्य महज ढाई महीने का था। अब उसकी उम्र 16 साल और 4 महीने है। इसके बाद अकेला के सास-ससुर ने बच्चे का सरनेम बदलने पर विवाद खड़ा कर दिया।

सास-ससुर ने पोते का सरनेम बदलने पर किया था केस 
अहलाद के दादा-दादी ने 2008 में अभिभावक और वार्ड अधिनियम 1890 की धारा 10 के तहत पोते का संरक्षक बनाने की याचिका दायर की थी। इसे निचली अदालत ने खारिज कर दिया था। इसके बाद दादा-दादी ने आंध्र हाईकोर्ट में याचिका लगाई कि बच्चे का सरनेम कोंडा से बदलकर अकेला कर दिया गया है। ललिता को गार्जियन मानते हुए हाईकोर्ट ने उन्हें पहले पति के सरनेम पर बच्चे का सरनेम करने का निर्देश दिया था। इस मामले को लेकर वे सुप्रीम कोर्ट याचिका दायर की थीं। 

अहलाद को गोद ले चुका है दूसरा पति
ललिता की कोर्ट में याचिका के फैसले में समय लगने के बीच 12 जुलाई 2019 को उनके दूसरे पति ने एक रजिस्टर्ड एडॉप्शन डॉक्यूमेंट के जरिए बच्चे को गोद लिया था। कोर्ट ने कहा कि जब कोई बच्चा दत्तक लिया जाता है तो वह उस परिवार का सरनेम ही रखता है। ऐसे में कोर्ट का हस्तक्षेप करना सही नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में क्या कहा 
1. बायोलॉजिकल पिता की मौत के बाद मां बच्चे की इकलौती लीगल और नैचुरल गार्जियन
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी मां बच्चे के बायोलॉजिकल पिता की मौत के बाद उसकी इकलौती लीगल और नैचुरल गार्जियन होती है। उसे अपने बच्चे का सरनेम तय करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने कहा कि अगर वह दूसरी शादी करती है तो वह बच्चे को दूसरे पति का सरनेम भी दे सकती है।

2. सरनेम को केवल इतिहास, संस्कृति के संदर्भ में नहीं समझा जाना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मां को नए परिवार में बच्चे को शामिल करने और उसका सरनेम बदलने से कानूनी रूप से रोका नहीं जा सकता है। सरनेम केवल वंश का संकेत नहीं है और इसे केवल इतिहास, संस्कृति के संदर्भ में नहीं समझा जाना चाहिए।

3. मां अपने बच्चे को दूसरे पति को गोद लेने का अधिकार भी दे सकती है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मां अपने बच्चे को दूसरे पति को गोद लेने का अधिकार भी दे सकती है। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस कृष्ण मुरारी की बेंच ने पहले के फैसलों का भी जिक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने मां को पिता के समान ही बच्चे का नैचुरल गार्जियन बताया था।

4. अलग सरनेम बच्चे की मेंटल हेल्थ के लिए सही नहीं
डॉक्यूमेंट्स में ललिता के दूसरे पति का नाम सौतेले पिता के रूप में शामिल करने के हाईकोर्ट के निर्देश को सुप्रीम कोर्ट ने इसे क्रूरता और नासमझी की श्रेणी में रखा। कहा कि यह बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य और आत्मसम्मान को प्रभावित करेगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि एक सरनेम बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक बच्चा इससे अपनी पहचान हासिल करता है। उसके और परिवार के नाम में अंतर होने से गोद लेने का फैक्ट हमेशा उसकी याद में बना रहेगा, जो बच्चे को माता-पिता से जोड़े रखने के बीच कई सवाल पैदा करेगा। हम याचिकाकर्ता मां को अपने बच्चे को दूसरे पति का सरनेम देने में हमें कुछ भी गलत नहीं दिखता।